Monday, 28 December 2015

इश्क का पैगाम

//तक़दीर को जीने वाले ,
तेरा यही अंजाम हुआ
जीते जी तो कुर्बान ही हुए ,
मरने के बाद ही एक जहान मिला .
कभी तारीख़ बनीं , कभी फ़साना बना .

एक मोहब्बत वो थी जिसे नादान समझ लिया
एक मुहब्बत ये जिसे दुनियाँ ने बदनाम कर दिया .
एक मुहब्बत ये कि देश पर अपनी जान दे दिया
पर , मुझमें क्या बसी थी , क्या किसी ने इसका एहतराम कर लिया ?

क्या कहें हम ऐसी रवायतों का
दस्तूरे - जिंदगी का ,
जहाँ तमाशबीन बना है हर कोई
ना परवाह है किसी की कुरबानियों का .

मुहब्बत जिसने भी की , जैसी भी,  जिससे भी की
पाकिजगी तो देखी होती ,
बुतपरस्ती तो देखी होती ,
अंजाम तो देखा होता .

हर मुहब्बत का अंजाम _ जुल्मत ,
एलाने - जंग , और मौत ही क्यों हो
ऐ खुदा मेरे ! कभी बंदों पर भी
तो रहम किया करो .

         कहते हैं " बहुत कठिन है डगर पनघट की " . वाकई बहुत कठिन है, चाहे  वो राष्ट प्रेम हो , व्यक्ति विशेष का अथवा वस्तु - विशेष से प्रेम हो . व्यक्ति विशेष को इसके अंजाम का पता नहीँ होता , ये तो हम और आप हैं जो इसे इतिहास या फ़साना बना अगली पीढ़ी तक पहुँचा देते हैं .

शुक्राना

जिंदगी जो हँस के गुजारनी चाही , गुजर ना सकी,
वो तो खुद से किया एक वादा था जो हँसकर गुजार दी .

जो तेरे दाग थे दामन में , और जो दाग लगे मेरे दामन में ,
उसे कभी धो ना सके , और इसलिये कभी खुल कर रो ना सके .

दुनियाँ के रंजिशों - रवायतों का बोझ कुछ ऐसा था कि ,
कभी ढो ना सके और इसके कभी हो ना सके .

दुनियाँ में अकेले ही आये हैं अकेले ही जाना होगा , इस रीत को निभाना होगा .

तुम कभी नाउम्मीद ना हो , नासाज ना हो
तेरे से वादा था संग रहने का , संग तेरे जिये जा रहे हैं .

नाकामयाबियों का शोक मनाना मुझे मंजूर नहीँ,  इसलिये हर दिन को जश्न की तरह जिये जा रहे हैं .

है तबाहियों का आलम चारों ओर , हिम्मत तो देखिये मेरी _
फ़िर भी खुद को संवारते जा रहे हैं .

अपनी कही

आज जरा 'उमर खय्याम 'को पढ़
       थोड़ा सूफीमय हो गई हूँ .

जिंदगी से इक वादा था चुप ना बैठूंगी कभी ,
चाहे जितने भी तूफान को पार हो करना  .

आवाजें लगाना ना था मकसद मेरा ,
ना था मकसद  हंगामे ही बरपा करना  

एक जगह से जो आई , इक उम्र जो मैंने पाई ,
तजुर्बा ही तो है , जिसे  लोगों को था बताना .

आज जिंदगी के उस मोड़ पे हूँ _ बस इतना समझिये , ग़म और खुशियों के बीच खड़ी हूँ . *

आशा का दिया जो कभी मैंने था जलाया  उसके लौ को बुझाया या आगे बढा रही हूँ .

जिंदगी तो नाम है उतार - चढाव का
क्या मैं उसे पार कर पा रही हूँ ?

सपना बस इतना है _ प्यार रहे , सौहार्द रहें ,
इस जीवन को जिया है , उस जीवन में है जाना  .

*वो स्थिति जहाँ दुनियाँ  ना आप को ग़म से  ग़मगीन  कर पाता और खुशी से आप उत्तेजित नहीँ होते .

मय : मधुशाला

मधुशाला में बैठे ताक रहे थे
कैसा होगा पीनेवाला
पूछा साकी से " कैसी
ये मदहोशी , कैसा ये पीनेवाला
बोली साकी_ अय्याशियों से है भरी
रास ना आयी अब के मधुशाला .
तब की मदहोशी अच्छी थी
सच्ची थी ,
राष्ट्र प्रेम में मर मिटने वाले
आया करते थे मधुशाला ."

वो शब . . .

गुजिश्ता शब की  बात है
भर शब कोई गा रहा था
मानो किसी को वो बुला रहा .
समा भी ऐसी , मानो ,
चाँदनी भी शरमाई - सी ,
काली घटा बादलों में मुस्काई -सी
आहटें , ऐसी कि किसी के आने से ,
सहम गई नार कोई दीवानी -सी .
गीत की तास्सिर  ऐसी , मानो
नार - दीवानी मंद-मंद - मस्त चाल से
अपने दीवाने के तार पर चली आ रही .
हवाओं की शीतलता ,
उसे घूंघट ओढा रही ,  मानो
सबकी नज़र से उसे बचा रही  .
इतनी वो प्यारी शब , मानो
मुझे भी अपनी गुजिश्ता याद करा रही .
जैसे - जैसे सुर - लहरियाँ
मेरे कानों तक आने लगी , मानो
कोई बिसरी - सी कोई , सामने मुस्कुराने लगी .
जितनी भी चाह रहा उसे भूल जाना  ,
क्योंकर वो मेरे क़रीब आ रही थी  .
वो जो गा रहा था , शायद
अपने दिल की गुनगुना रहा था .
शायद अपने भी तार कुछ मिल रहे थे
तभी तो उन तानों पर ,
मैं भी खींचा चला आ रहा था , मानो
अपने अजीजो - जान को मना रहा था ,
ना जाने किस बात से मैं
वाबस्ता हुआ जा रहा था .

Thursday, 24 December 2015

तमाशा

" तमाशा "
बचपन में तमाशा देखना
बहुत बड़ा शौक था ,
जॉक था .
चले जाते थे उँगलियाँ थामे ,
बाबूजी के संग .
कभी खुद को निहारते ,
कभी तमाशे के रंग - ढंग .
हर इक अदाकार सयाने लगते ,
बड़े होने पर हर के मायने
बदले लगते .
क्या जानते थे _
जिस जोकर को देख
हम कभी हँसा करते थे ,
अब सूरते- हाल ये है कि
जोकर के मानिंद
अपनी जिंदगी जिया करते हैं .
पहले जिन बातों पे आती थी हँसी ,
आज वही हालात रुलाया करते .
चलो बहुत हो चुकी है शाम ,
थोड़ा खुद को सँवारा जाये .
बहूत जी लिये ग़म में ,
अब खुद को हँसाया जाये .

लक्ष्य

जब लक्ष्य को साधा है ,
तमाशा भी वही है ,
सूरत भी वही है ,
सीरत भी वही है ,
भीड़ भी वही है .
क्यों कोई फ़िर पथ भ्रमित हो ,
ये तो किस्सा वही  है _
इक तीर - कमान वाला अर्जुन है ,
और उसका निशाना है .

क्रांति

कविता समूह के एक कवि मित्र जिनका सम्बन्ध जम्मूकश्मीर से है , उन्होंने वहाँ के हालात पर कविता के माध्यम से अपनी बेचैनी को रखा  . मेरा ये मानना है की हर राज्य के अपने मुद्दे को लेकर वहाँ की जनता परेशान है . मेरी जो भावनायें हैं , उसे व्यक्त करती हूँ .कि _

पैमाना अभी भरा नही ,
इसलिये जुबां लड़खड़ाती है ,
क़दम लड़खड़ाते ,
सोहबतें  नाखुशगंवार है
महफिलें सजतीं तो हैं ,
पर नासाज हैं .
लोग बदहाल है .
यकीन बस इतना है ,
जिस दिन पैमाना भर गया _
तीर या तो आर होगा
या फ़िर पार होगा .

राष्ट्रवाद

आज हम किस हाल में पहुँच गये हैं कि देश के सम्मान की तो बात ही समाप्त हो गयी है. अपनी  लोकप्रियता का इतना अच्छा shortcut निकाल लिया है कि मानसिकताओं पर हैरानी होती है . नेता तो नेता अब लेखक भी जिसे सम्भ्रान्त और बुद्धिजीवी वर्ग कहा जाता है और समाज में एक आदर का स्थान है , उन्हें भी इतनी तुच्छ प्रसिद्धि का मार्ग मिला . क्या उनके ऐसा करने से उनकी तटस्थता विलीन नहीँ हो गयी और खुद को भी राजनीतिक मायाजाल में नहीँ धकेला . शायद ये घातक स्थिति की तरफ़ इशारा कर रहे हैं . 

" राष्ट्रवाद "
बचपन में जिनके किस्से- कहानियाँ
सुनी थी ,
उन्हीं बातों को, सवालातों को
बड़े होने तक लिये चली थी .
अब मैं आज़ाद हूँ ,
अपने सोच की परवाज़ हूँ ,
बस यही सोच से ,
साम्यवाद को अपनाया था ,
मार्क्स को अपना खुदा बनाया था .
जवानी में मार्क्सवाद का नशा ,
इतना सर चढ़ कर बोलेगा _
समाज बदलने की ताकत ,
खयालात बदलने की ताकत ,
मंदिर, मस्जिद, अट्टालिकाओं को
ढाहने की ताक़त ,
एक समदृष्टि बनाने की ताक़त
दिवास्वप्नों में आने लगी .
नींद खुली तो पाया _
अपनेलोगों ने ही तो
साम्यवाद में घुन लगाया .
बस अब इतना समझ में आया कि ,
" वाद " कोई भी बुरा नहीं होता .
ये तो परिस्थितियाँ हैं जो
इंसानों से समाजों में बन जाती हैं .
गरीबी में " साम्यवाद "
अमीरी में "बाज़ारवाद और साम्राज्यवाद " ,
सोया रहा तो नित " गुलामी " ,
जाग गये तो " क्रांति " पक्की .

शायद इससे सच्चा रिश्ता कुछ नहीँ .

तुम मैं हूँ ,
मैं तुम हो .
तुम हो तो मैं हूँ ,
और नहीँ
बस कुछ भी नहीँ .
कायनात भी हम से - तुम से है .
हम नहीँ - तुम नहीँ
तो कुछ भी नहीँ .
पर ये जाने कौन , माने कौन ?
यही सत्य है ,
यही शाश्वत है ,
फ़िर ये दुनियाँ क्या
और मोह - माया क्यों ?
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शब्बा -खैर

शब्बा - खैर (शुभ रात्रि )

वो शाम कुछ अजीब थी , ये शाम भी कुछ अजीब है .
मैखाना भी यही था , दिले जाना भी यहीं ,
बात कुछ भी ना हुई ,
पैमाना बदल गया .

चित्र : आदरणीय मीना कर्ण .

किचन में कविता

किचन मे कविता लिखने  की  बात है  ,
बड़े  ही मस्त वाकयात हैं .
कमाल तो देखिये _
महँगाई में भी अपनी कविता के सहारे
खुशहाली की उड़ान भरते हैं .
अब तो कानून के नियम भी
बदले से ही लगते हैं .
क्योंकि ,
जहाँ तलाक था घरेलू हिंसा का कारण ,
कवियित्रि पत्नी की कविता ही हो गया 
तलाक़ का कारण .

सेहरा

आपने तो अपनी  गुज़ार ली ,
जो गुजारनी थी .
अब है हमारी बारीै
लगा कर रेत में  पौधे
है निभानी बहुत बड़ी जिम्मेदारी .
सींचा  इस उम्मीद से है
कि शायद कभी ना कभी
रेत भी मिट्टी हो जाय .
बार - बार पौधे को गिरता देख
उम्मीद बँध आती है .
बार - बार आँखें मींचते भी
इक रौशनी नज़र के पार
उतर आती है के _
तुम नाराज़ ना होना ,
नाउम्मीद ना होना ,
बेशब्र ना होना , क्योंकि
वो सुबह  ज़रूर आयेगी ,  जब
सेहरा में बहार छायेगी

सौंदर्य

ये घटा ,
ये छटा ,
ये लाली
उसके पीछे हरियाली
                 मदमाती , लहराती
                  छेड़े अपने आने की तान
                   ये है झरने की गान .
मानो , अपने प्रियतम को ढूँढती ,
मंजिल को चूमती ,
आ पहुँची है मक़ाम तक .

चित्र : आदरणीय मीनाजी के wall से .

दस्तूर

किस ज़माने की बात करते हैं आप
हमने सदियों से यही  देखा ,
लोगों  की बस्ती में कुछ
इंसान जिया करते .
यही दस्तूर है ज़माने का , कि
मांझी से हम कभी सबक
ना लिया करते.

इश्क

सुप्रभात .

इश्क कोई वस्तु नहीँ कि ,
माप - तौल किया करें .
इश्क शिद्दत से निभाई नहीँ जाती ,
बहुत नाजुक दौर है , जहाँ
पैमाने बदल जाते .

चित्र : मीना दीदी के wall से .

आपका साथ

आपके अफ़साने को
फ़साना ना बनने देंगे ,
दिल की जो बात लिखी है
उसे हकीक़त बयानी का नाम देंगे .
जो माझी हो जाये तो
जिक्र तारीख़ में करेंगे .

चित्र : मीना दीदी के wall से .

हाथ छूटे से रिश्ते. . .

रिश्ता जो तुम से बना
उसकी कोई सूरत ना थी .
क्योंकर मिलने का बहाना ढूँढते
उसकी भी तो कोई वज़ह ना थी .
कैसी वो आराइश , कैसा वो वाबस्ता !
अब जो मिले हो तो कहते हो कि
तेरी ज़रूरत ही नहीँ .
पर ये भी तो सही है ना ,
कि ,
हाथ छूटे से रिश्ते
टूटा नहीँ करते .

दोस्ती

कहते हैं कि दोस्ती में
दोस्त खुदा होता है ,
चलो ये भी अच्छा ही हुआ,
मुतमईन हुए  कि
वो तुम्हारे जैसा होता है .

वजूद

मैं कहीँ नहीँ थी तो वो मैं थी
हर बात की गवाह मैं थी ,
जो होना था वो मैं थी ,
जो ना होना था वो भी मैं ही थी
विलीन भी वीरान भी , फ़िर भी
बात वहीँ की वहीँ _
" मैं कही नहीँ " .
शुभ रात्रि .

ये कैसी जर्रानवाजी

जर्रानवाजी की हद तो देखें जनाब
चाँद ने दीपक के सामने
घुटने टेके आज .
बोला चाँद इंसान से
मेरा साथ तो एक आँख मिचौनी है
कर ले दोस्ती दीपक के संग
वाबस्ता है तेरा ,
तेरे ही संग इसकी
आनी और जानी  है .

Wednesday, 23 December 2015

जब मैं ना रहूँगी

डर भी रही थी और पढ भी रही थी .
आपने तो डरा ही दिया
ढाढस बंधाने वाली ही थी कि
ऐसी बातों को ना सोचा करते .
तभी जो आगे नज़र पड़ी _
हे भगवान ! 
आपने तो बुद्धू ही  बना  दिया .

                           सुप्रभात .

खाकी

खाक से  बना है  इंसान ,
खाक में मिल जाना है खाकी .
लेके कुछ भी नहीँ जाना यहाँ से ,
फ़िर क्यों तूँ  हो बदनाम ऐ खाकी .

गोरख धन्धे

आत्मा तो शाश्वत है ,.
चेतना का ही असर हो .
भौतिकतावाद में हमने चलन देखे
साधुओं और सन्तों की बढ़त देखे
काला बाजारी और काला धन देखे 
बेईमानी के धन से दान - पुण्य लेने का अवसर है ,
अब तू इसे जिस तरह से देखे _
आओ ज़रा तेरी भी राहे- चिंतन - मनन देखें .

Album - 22

Album - 21

Album - 20

Album - 19

Album - 18

Album - 17

Album - 16

Album - 14

Album - 14

Album - 13

एहसास

ना तेरा कोई रुप , ना तेरा कोई
रंग ना कोई सीमा
ना कोई तेरी परिभाषा ,
कभी पूनम की चाँद लगे
कभी मन तारों के साथ चले
कभी राधा के रुप में ,
तो कभी मीरा के रुप में .
माँ की ममता छाँव
तो कभी भाई - बहन के भाव में
उदास मन दोस्तों की तलाश करें
बुजुर्गों का सर पर जो हाथ रहे
तो जीवन में आगे बढ़ते रहने का प्रयास रहे .
और कुछ भी ना कहने की बात है
बस इतना कि _
ऐ प्यार तेरा एहसास बड़ा प्यारा लगे .

thanks a lot laughing colour .

Album - 12

Album - 11

ये कैसा असर

मुहब्बत का ये कैसा असर
उसने मुस्कुरा के देखा तो
खुद पे ऐतबार ना हुआ ,
और जो मुँह मोड़ लिया तो
उस पे ऐतबार ना रहा .
फ़िर भी हिम्मते - मरदाँ तो देखिये _
नज़रें जहाँ तक गयी
तलाश बस उन्हीं की रही .

मुसाफिर

मुसाफिर हैं इस लम्बे सफ़र का ,
चलते जाना है अपना  काम ,
राह - राह पर डगर अलग है
पकड़ अलग है , मन भावन है ,
पथ भ्रामक है , कभी कारवां ,
कभी तन्हाई 
मीत मिले हैं , प्रीत मिली है
और मिलन के साथ जुदाई ,
इन सब की अनुभूति से
दिल ना लगाना . क्योंकि ,
मुसाफ़िर तुम्हें तो है चलते जाना .

बुनियाद समय से

ये ना सोचिये गुजरा साल
भूला जाएगा ,
जो कुछ भी गुजरी
उसी बुनियाद पर नया साल
उम्मीदों और खुशियों से
दामन भर लायेगा .

सोच

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
चल उठ जा प्राणी
नम पड़ा क्यों तेरी आँखें
कर ले तू दुनियाँ से प्रीत .

सुप्रभात .

सलाम जाते हुए साल को

ऐ गुजरता हुआ ये साल,  तू ये पैगाम लिख दे
कि " जाने वाला कुछ कमतर ना था ,
इसके आगे की कहानी तू अपने नाम लिख ले . "

किसी सोच की बुनियाद मांझी के दम पर होती है चाहे वो अच्छी हो या बुरी या फ़िर क्रांति , शांति या बगावत .

अतीत

जब इंसान की सेहत नासाज हो और रात का समय , चारों तरफ़ से खराटे की आवाज़ हो तो मन और दिमाग बहुत बेचैन होने लगता है . ऐसे में हम अपने पिछले जीवन के कई काल खंडों को जी जाते हैं _ अच्छी भी और बुरी भी . गत तीन - चार दिनों से viral के चपेट में हूँ . बेचैनी के आलम में मैं अपने विश्विद्यालय के ज़माने में जा पहुँची . (मेरा मानना है कि JNU , New Delhi में बिताये पाँच साल मेरे लिये बेशकीमती है. मुझे वहाँ के जर्रे - जर्रे से आज भी उतनी ही मुहब्बत है .)मेरे उन्हीं दिनों को समर्पित ये कविता _

आज ना जाने अतीत में मन क्यों विचर रहा ,
उन दोस्तों को तलाशती मेरी आँखें और मन
मुस्कान भर रहा .
था वो दौर जब हम चाय की चुस्कियों पर मिला करते ,
25पैसे की एक प्याली पर घंटों विश्व पटल पर चर्चे किया करते, और
ऐसे ही मद - मस्त जिया करते .
कभी अपने वाद- विवादों से PM की कुर्सी को
हिलाया करते , और
बन पड़ी तो नये CM को अपनी बात में लाया करते .
वो भी क्या दौर था _ मंडल - कमण्डल का चहूँ ओर शोर था .
सद्दाम बने थे हीरो , क्लिंटन के लिये भी चर्चा कुछ और  था . 
ना था वो उतना मोबाइल और इंटरनेट का ज़माना
पर खबरें तेजी से फ़ैल के हो जाती फ़साना .
पर जनाब , जेहनी लोगों का दौर था ,
इल्म की बातों से ही खुद को हम अमीर समझा करते ,
जेब में कहाँ थे इतने पैसे कि खुद को  गरीब समझाकरते .
आज ना वो दोस्ती है ना दौर है ,
बस पैसे ही पैसे की होड़ है .
रिश्ते भी पैसे ही ढूंढा करतीं ,
इंसानों की ना रही कोई पूछ है .

जिंदगी से दो टूक बातें .

जिंदगी जो हँस के गुजारनी चाही , गुजर ना सकी,
वो तो खुद से किया एक वादा था जो हँसकर गुजार दी .

जो तेरे दाग थे दामन में , और जो दाग लगे मेरे दामन में ,
उसे कभी धो ना सके , और इसलिये कभी खुल कर रो ना सके .

दुनियाँ के रंजिशों - रवायतों का बोझ कुछ ऐसा था कि ,
कभी ढो ना सके और इसके कभी हो ना सके .

दुनियाँ में अकेले ही आये हैं अकेले ही जाना होगा , इस रीत को निभाना होगा .

तुम कभी नाउम्मीद ना हो , नासाज ना हो
तेरे से वादा था संग रहने का , संग तेरे जिये जा रहे हैं .

नाकामयाबियों का शोक मनाना मुझे मंजूर नहीँ,  इसलिये हर दिन को जश्न की तरह जिये जा रहे हैं .

है तबाहियों का आलम चारों ओर , हिम्मत तो देखिये मेरी _
फ़िर भी खुद को संवारते जा रहे हैं .

नारी तेरी जुबानी

हर बार खुश होकर इतराती हूँ
जन्म सफ़ल है मेरा जो _
जो बेटी बन घर आई हूँ . तभी चीखने की आवाज़ जो आई , मन बोला
हे  मेरे भगवान , क्यों तूने ऐसी रचना बनाई . 
जिसने  वजूद है ऐसी पाई जो ,
इंसाँ को ना जीने देता है , ना मरने देता .
कहने को तो ये सुन्दर नारी है
एक विश्वास है ,
पर जिसके जन्म से बदले- बदले से
सबों के एहसास हैं .
कहने को तो ये ससुराल की लक्ष्मी है .
पर कौन जाने ,
ये उसकी बदकिस्मती है .
विडम्बना ये कैसी  कि तुझे जो
जीवन दे डाला _
कहने को तो तुम में
चंद्रमा की शीतलता
मधु की मधुरता , मोरनी सी चाल है
क्या सच में ये हाल है ?
ज़िंदगी की रफ़्तार ने , ज़माने के कुचाल से
विशेषण सारे विलीन हो गये .
ज़िंदगी की आज़माइश में
जो बचा रहा , वो है दुर्गा का रूप ,
अब बस यही तेरा रूप ,
तेरा यही स्वरूप .

एक श्रधांजलि 'nirbhyaa' स्व . ज्योति सिंगजी को .

सूफियाना मन - तरंग

आज जरा 'उमर खय्याम 'को पढ़
       थोड़ा सूफीमय हो गई हूँ .

जिंदगी से इक वादा था चुप ना बैठूंगी कभी ,
चाहे जितने भी तूफान को पार हो करना  .

आवाजें लगाना ना था मकसद मेरा ,
ना था मकसद  हंगामे ही बरपा करना  

एक जगह से जो आई , इक उम्र जो मैंने पाई ,
तजुर्बा ही तो है , जिसे  लोगों को था बताना .

आज जिंदगी के उस मोड़ पे हूँ _ बस इतना समझिये , ग़म और खुशियों के बीच खड़ी हूँ . *

आशा का दिया जो कभी मैंने था जलाया  उसके लौ को बुझाया या आगे बढा रही हूँ .

जिंदगी तो नाम है उतार - चढाव का
क्या मैं उसे पार कर पा रही हूँ ?

सपना बस इतना है _ प्यार रहे , सौहार्द रहें ,
इस जीवन को जिया है , उस जीवन में है जाना  .

*वो स्थिति जहाँ दुनियाँ  ना आप को ग़म से  ग़मगीन  कर पाता और खुशी से आप उत्तेजित नहीँ होते .

हास्य : शृंगार रस में .

सोचा चलो थोड़ा शृंगार  और हास्य रस को मिलाया जाय :-
 
एक मद - मस्त महाराज
लिये होठों पर मंद - मुस्कान
चले जा रहे थे अपने नार - नवेली के संग .

वो गजगामिनि इठलाती , बलखाती
चले  जैसे नदी के संग इतराती , इठलाती
पर्वतों के संग लहराती ,

चल रही जैसे घटाओँ से करती अठखेली
कभी करे छटाओं से आँख मिचौनी ,
कभी पूनम की रात लगे .

चले झरनों के संग , जैसे
लागे बजे मृदंग , बजे पायल की छम - छम
है सोलहों कला परिपूर्ण .

कोमलता , जैसे सही ना जाय
वाणी , जैसे वीणा की तान
भाव , जैसे हो मृदु मुस्कान .

गोरी बाहों को देख , उत्सुकता का बढ़ा वेग
जैसे क़दम बढा महाराज का, पत्नी की आवाज़ आई
" अजी सुनते हो , भोर हुई क्यों नहीँ उठते हो .

क्या आफिस नहीँ है जाना , जीविका नहीँ है चलाना
ना जाने नींद में क्या - क्या बोलते रहते हो
मुझ पर क्या गुजरती है , क्या कभी सोचते हो .

इतने में महाराज की नींद खुल गई
सपनों की नार - नवेली ना जाने कहाँ विलीन हो गई .
अब क्या था _ बस ढाक के वही तीन पात
वही जीवन , वही दिन और वही रात .

मुहब्बत

//तक़दीर को जीने वाले ,
तेरा यही अंजाम हुआ
जीते जी तो कुर्बान ही हुए ,
मरने के बाद ही एक जहान मिला .
कभी तारीख़ बनीं , कभी फ़साना बना .

एक मोहब्बत वो थी जिसे नादान समझ लिया
एक मुहब्बत ये जिसे दुनियाँ ने बदनाम कर दिया .
एक मुहब्बत ये कि देश पर अपनी जान दे दिया
पर , मुझमें क्या बसी थी , क्या किसी ने इसका एहतराम कर लिया ?

क्या कहें हम ऐसी रवायतों का
दस्तूरे - जिंदगी का ,
जहाँ तमाशबीन बना है हर कोई
ना परवाह है किसी की कुरबानियों का .

मुहब्बत जिसने भी की , जैसी भी,  जिससे भी की
पाकिजगी तो देखी होती ,
बुतपरस्ती तो देखी होती ,
अंजाम तो देखा होता .

हर मुहब्बत का अंजाम _ जुल्मत ,
एलाने - जंग , और मौत ही क्यों हो
ऐ खुदा मेरे ! कभी बंदों पर भी
तो रहम किया करो .

         कहते हैं " बहुत कठिन है डगर पनघट की " . वाकई बहुत कठिन है, चाहे  वो राष्ट प्रेम हो , व्यक्ति विशेष का अथवा वस्तु - विशेष से प्रेम हो . व्यक्ति विशेष को इसके अंजाम का पता नहीँ होता , ये तो हम और आप हैं जो इसे इतिहास या फ़साना बना अगली पीढ़ी तक पहुँचा देते हैं .

Wednesday, 2 December 2015

मुहब्बत की  दास्तां ऐसी कि
  ना आगाज का पता
  ना अंजाम का पता 
आशाओं और उम्मीद में  जीने वालों में  किस्से इसके अधूरे  ही रहे ,  वर्ना ना कोई राधा होती  ना मीरा ने जन्म लिया होता  ना ही किसी  सूफी का दीद हुआ होता .

'आह ' से 'वाह ' का सफ़र कितना कुछ कह जाता है . 'आह ' में रहकर प्राणी सफर 'वाह ' की कर जाता है . कितनी उम्र गँवा जाता 'आह ' में बस इक 'वाह ' के पाने में . जब तक जीया 'वाह ' की खातिर तब तक 'आहों ' में ही जीवन बीता . जब से 'वाह ' की चिंता छोड़ी 'आह ' ने भी दामन मेरा छोड़ दिया . जीवन से बस इतना सीखा खुद कॊ ऐसे प्यार करो , विश्वास करो ना फ़िर ख्वाहिश हो पुनर्जन्म की ना ही किसी से उम्मीद रहे . फ़िर क्यों कोई 'आह ' भरे , फ़िर क्यों कोई 'वाह ' करे.