Monday, 26 December 2016

पर्यावरण सम्वर्धन

पर्यावरण संवर्धन

​"पर्यावरण सम्वर्धन "
प्रकृति से है संस्कृति 
संस्कृति से
प्रकृति का गुणगान 
पंच भूत से बनी प्रकृति 
पंचभूत का है इंसान 
हरियाली इसकी आत्मा,
है और स्वांस भी
प्रकृति प्रदत्त यह पर्यावरण 
हरीतिमा है इसकी शान भी
क्यों कर रहा तू
इसका अपमान 
भौतिकता की ये कैसी
परिभाषा 
अतिवादीे से हुई ये दुर्दशा 
खुद को सम्भ्रांत बताने में 
वृक्षों से खिलवाड़ हो रहा 
प्रौद्योगिकी के नाम पर 
पर्यावरण दोहन से
खुद को माला-माल किया 
सभ्यताओं के ढहने का 
ना कभी कोई ख़याल किया 
क्या होगा फ़िर
आने वाली नस्लों का
क्यों नहीं ये तूँ सोचता
अभी भी तो दर्पण देखना
अब भी कुछ तो हो सुधारना
नवनिर्माण की खातिर 
आओ , एक बार फ़िर से 
प्रकृति की ओर हो लौटना.

Monday, 21 November 2016

रहिमन या संसार में.....

           संस्कृत में एक श्लोक हम पढ़ा करते थे जिसमें तीन के पुरुषों की व्याख्यान की गई है_प्रथम पुरुष,माध्यम पुरुष एवं उत्तम पुरुष. 'प्रथम पुरुष ' की श्रेणी में उन लोगों को रखा गया जो कुछ करना ही नहीं चाहते(यानी सभ्य भाषा में आलसी), 'माध्यम पुरुष' वो जो कुछ करना चाहते है और उस और कदम भी बढ़ाते परन्तु बीच रास्ते में ही उनका लक्ष्य साधना डैम तोड़ देती है. और 'उत्तम पुरुष ' वो जो अपने लक्ष्य पर चलते जाते है चाहे कितनी भी रास्ते में दुश्वारियाँ क्यों ना हो. पर ऐसे लोग बहुत कम ही होते हैं. ग्रीक इतिहास में प्लेटो ने एक राजनीतिक योद्धा की ऐसे ही कल्पना की थी और ऐसा करने में वहां व्यक्ति का चुनाव होता था और चुनावित व्यक्तिओ को कठिन प्रशिक्षण और नियम से होकर गुजरना पड़ता था. खैर ये सब तो हुई राजनितिक इतिहास की बातें , पर इसकी चर्चा भी आवश्यक है. वह इसलिए कि आज भारतीय समाज और राजनीति में जो बदलाव आ रहे उसे यहां के लोग शायद पहले कभी देखा नहीं. हालांकि या कहना गलत होगा कि इससे पहले कोई परिवर्तन आया ना हो. क्योंकि 'इतिहास' समय के संग समाज में आये परिवर्तन की दास्तान ही तो है.
              आज हम जिस परिस्थिति में जे जी रहे हैं , बेशक क्रियाशील हर कोई है, जागरूक हर कोई है अपने भविष्य के प्रति, अपने परिवार के प्रतिऔर अपने सन्तान के प्रति. परन्तु जब समाज या देशहित की बात करें तो हमारी भूमिका संस्कृत के प्रथम पुरुष और मध्यम पुरुष वाली ही होती है. और जब हम देश के हालात और गतिविधि के बारे में चर्चा करते हैं तो कही खुद के लिए 'मध्यम पुरुष' को परिभाषित तो नहीं कर देते......
           हमारे देश की परेशानी ही यही है कि वह प्रथम पुरुष और माध्यम पुरुष बन कर रहना चाहती है और जो थोड़े उत्तम पुरुष होने की चेष्टा भी करते उसे समाज की सहायता और सहानुभूति मिलने के स्थान पर उससे कहीं ज्यादा अवहेलना और तीखे बाण झेलने पड़ते हैं.
  दूसरी परेशानी यह कि जब कोई कार्य समया के मांग अनुसार हो रहा होता है तो उसे किसी 'वाद' के साथ क्यों जोड़ देते हैं? तब जबकि हम और आप इस बात को जानते हैं कि समाज में जब कभी बदलाव आता है तो उसके परिवर्तन (चाहे सफल हो या असफल)को हम नाम देते हैं ना की पहले नाम दे दिया जाता है और फिर उसके अनुरूप क्रिया होती है. यह ठीक वैसे ही मुझे लगता है कि बच्चा अभी माँ के गर्भ में है पर उसका नामकरण कर दिया जाय. परिणाम जो हो वो देखा जाय.
      मोदी जी ने ये तो नहीं कहा की वो समाजवाद लाना चाहते . वक्त की माँ ग के अनुसार कदम बढ़ाया ही है. जो करने वाले होते हैं उन्हें भविष्य सताती नही बल्कि प्रेरित करती है ,ख्वाब देखने वाले ही कमज़ोर पड़ते और समाज को कमज़ोर करते हैं .
       राजनीति में क्या अच्छा होगा और क्या बुरा होगा वह सभी को पता होता है, पर अगर कोई अच्छी बातों के लिए कदम आगे बढ़ाए तो प्रोत्साहित करना हमारा कर्तव्य होता है. यह ठीक उसी प्रकार से की अगर परिवार  के मुखिया पर अगर परिवार के सदस्य विशवास करना छोड़ दे तो वह मुखिया कैसा होग़ा और वह परिवार कैसा होगा इसका अंदाज़ा आप और हम लगा सकते. सोच, समझदारी ,क्रियाशीलता हर मुखिया में होती है परंतु सहारा,सहानुभूति और समर्थन की दरकार उसे अपने परिवार से होती है. दूसरी तरफ परिवार एक बच्चे के सुन्दर भविष्य की कल्पना में बहुत कुछ सही गलत को नज़र अंदाज़ कर उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करते है वैसे ही समाज भी एक परिवार होता है और उसके सुखद भविष्य की कल्पना में हम सब का यह दायित्व बनता है कि देश हित में लिए गए अच्छे कदमों का पुरजोर समर्थन करें और प्रोत्साहित करें. अच्छा समालोचक होना और एक विविधता वाले देश का मुखिया बन नई राहों पर कदम बढ़ाना आसान नहीं . और तब, जब की देश की जनता अपनी रईसी में 'क्यों 'और 'कैसे' जैसे सवाल पूछना भूल वो मॉल और पार्टी की संस्कृति को जी रही और सोच रही की देश का काम देश जाने हम तो अपना काम कर बैठे.
       अभी देश एक ऐसे दो राहे पर खडी है जहां सफलता की सीढ़ी मुश्किल तो लग रही पर कठिन नहीं. बस थोड़े साहस की जरुरत है और भगवान ने हमे कलम का वरदान दिया है तो अपने कर्तव्यों का निर्वहन हो.
@Ajha.22.11.16

Sunday, 9 October 2016

मेरे हमसफ़र

तेरी की,तो तूँ जाने
मैंने सजदे में
सर झुका दिया
मैं ना देखूं
काशी, ना काबा
और  मैखाना ही
तेरे जलवे की बात
जब भी हो
वही हो मेरा बुतखाना भी
वो अंगूरी बाग़ तुम से
वो चश्मे *की आबी आब तुम से (water spring)
ये ताब *चाँद ओ सितारे की क्या कहें(brightness)
ये मौसम सुहाना क्या कहें
बस जान ले इतना
ये माहौल खुशगवार, यानि
तर्जुमा तुम से है
इस माहौल में आ चल
इक घूंट हम भी
लाफ़ानी (immortal)पी लें

जय माँ अम्बे

"जय माँ जगदम्बे "
----- ---------------- 
खूब जमा है दरबार माँ
आशीर्वादों से भरा
तेरा दरबार माँ
इक अजीब समां है बंधा
सुंदर है तेरी मूरत
हर कोई में बसी तेरी सूरत
हर कोई भक्त तेरा
भक्ति में तेरे है डूबा हुआ
तेरे दरवार में
दिखा ना आज कोई सवाली
जिधर भी गई नज़र
है बस खुशहाली ही खुशहाली
नाचे-गाये है सब मिलकर
बच्चे और नर-नारी
तेरा ऐसा जादू माँ
ना सोच ना फ़िक्र है कल की
मैया हम सब मिलकर मांगे
ऐसा एक वरदान दो
मिलकर हम सब एक रहें
हर एक दिन त्योहारों सा हो
सब का इस धरती पर
कल्याण हो.
@Ajha.31.03.17
स्वरचित:अपर्णा झा

Tuesday, 20 September 2016

बहकाये हुए क्यों

http://wp.me/p7Dq43-7e
बहकाये हुए हो क्यों

कल तक जो था तुतला के बोल रहा

मेरी ही हथेली थामें वो 

हँसते हुए था चल रहा

थी ख्वाहिश जिसे आसमाँ की

आज भला क्यों वो चुप हो गया

तब की बातें थीं, माँ की गोद थी

था वो खुशकिस्मती को लिख रहा

पर वो वरक़ आज कहीं गुम हो गया

ऐसी इक बदहवा चली कि

उसमें कहीं गुम तुम हो गए

कैसा रहबर तुझको मिला कि

सारे आशनाई दूर तुमसे हो गए

ये कैसी बर्बरता तुमने सीखी

लोग मातम हैं मना रहे 

और दूर कहीं छुपे हुए तुम खुश हो रहे

ये राहे बहिश्त कैसी! 

जो जीना तुझे आया नहीं

इस जीवन की ख़ुशी ना मना सके

अनदेखी जन्नत में तुम हो ईद मना रहे

तारीख है गवाह इसकी

'तेरे-मेरे' के किस्से में 

भला ना हुआ किसी का

 नुक्सान ही नुक्सान हर कोई हैं उठा रहे.

बस करो अब इक गहरी साँस लो

रूह को जो इक जिंदगी मिली

ज़रा उसकी कदर करना सीख लो.

@Ajha.20.09.16

Friday, 26 August 2016

विरासत के धरोहर

                   " सांस्कृतिक विरासत के धरोहर "
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                  आखिर पहुँच ही गई मैं मोदीजी के कर्मभूमि पर और उनके प्रिय विषय "बनारसी
बुनकरों "तक. कला संस्कृति में मेरी रूचि ने मुझे जिन माहिर कलाकारों और कारीगरों से मिलवाया है मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि पुराने जमाने के तपस्वियों से मुलाक़ात तो नहीं हुई परन्तु आज के  जमाने में तपस्वियों का रूप मैंने इन्हीं में देखा है. ऐसी कारीगरी, छवि एक फ़कीर-सी, बातें करो तो एक निश्छल सी मुस्कान चेहरे पर और नहीं तो अपनी तपस्या में रमें  हैं ये लोग.
                    वाकई आज जब बनारस के इन बुनकरों और मालिकों से मिली तो पता लगा की इन बुनकरों का जीवन इतना आसान नहीं होता जितनी आसानी से ये हमसे मुस्कुरा कर मिल जाते. एक कमरा जिसमें हस्तकरघा लगा होता , ना कोई शाही बैठक और रौशनी भी ठीक उतनी ही जो इनके काम को अंजाम देदे. इसी धुंधली सी रौशनी के आलम में नित्य अपने कारीगरी से कला को जन्म देना और उसे परवान चढ़ाना, कितनी खूबसूरत और दिलकश सी लगती ये बातें पर इसके पीछे की सच्चाई भी उतनी ही कड़वी.
                आंकड़ों और सहयोग कि बातों को में ना पड़ते हुए इससे परे हमें इस सच्चाई को जानना पडेगा कि इतनी बारीक काम करने में कारीगरों की कम उम्र में ही आँखों की रौशनी घटा देती है और रीढ़ की हड्डी एवं पसलियों को रोगग्रसित कर देती है इस कारण यह बहुत दिनों तक काम करने लायक नहीं रहते. जो पैसा इन्हें मालिकों से मिलता है उसके जीवन यापन योग्य नहीं होता और इस कारण इनके बच्चे पलायनवाद की राह पर हैं.विरासत में मिली कला ,गरीबी की मार और भौतिकटावाद की प्रतिस्पर्धा के आगे अपनी साँसे गिनें क्या यह उचित होगा. ऐसे कारीगर जिनकी लगन और मेहनत से हमारी सांस्कृतिक विरासत विश्व पटल पर हमेशा से गौरवान्वित होते रही है क्या इन्हें लोगों का समर्थन और सरकार की सीधी छत्र-छाया(जहाँ बिचौलिए या मालिकों का इन्हें मुँह देखना ना पड़े) नहीं मिलनी चाहिए ताकि हमारी कला ,कलाकार, और कारीगर स्वछन्द हो ख़ुशी से साँसें ले सके.
                मोदी सरकार ने कदम तो उठायें हैं, पर इतने दिनों की बदहाली के बाद मन हमेशा शंकित रहता है कि आशा के सपने देखने के बाद कहीं फिर से वो कराह ना निकले_
  "थी मुझे जिनसे वफ़ा की उम्मीद, वो नहीं जानते वफ़ा क्या है"_
        ---  मिर्ज़ा ग़ालिब
 
@Ajha. 26.08.16
Copyright @Aparna Jha
Photo and vedeo @Ajha, Aparna Jha.

Wednesday, 24 August 2016

एक परिप्रेक्ष्य: सास-बहू का किस्सा

एक परिप्रेक्ष्य:सास-बहू का किस्सा(बेटीपढ़ाओ,बेटी बचाओ)

                रीता कई दिनों से अपने पति औरघरवालों को उदास देख रही थी और यह भी सत्य था कि वह खुद भी उदास सी ही रह रही थी. उसके मन में कई सकारात्मक एवं नकारात्मक भाव उत्पन्न हो रहे थे जिस से वह खुद को भी जोड़े जा रही थी .विस्मित हो रही थी कि वह किस भावना से ज्यादा दुखी है_पति के दुःख से या बच्चों के दुःख से या तुलनात्मकता अपने भावों और पति, बच्चों के सोच और दुःख से.उसे आज समझ नहीं आ रहा था कि उम्र के 50वें पड़ाव में ये कैसी उथल-पुथल, जिसमें वह फंसी जा रही थी,जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी. उसने तो गार्हस्थ जीवन को जीना सीख लिया था और फिर उसी अनुरूप अपने घर के कामकाज ,बाल-बच्चे और पति के साथ सुख से जीवन व्यतीत करने लगी थी. हर छोटी-छोटी बातों पर खुश हो लेना, अपने सपने को बच्चे और पति के भविष्य में देखना यही तो अब उसका सपना हो चला था.

                वह दुबली-पतली सी भारतीय नारी की साक्षात प्रतिमूर्ति को आज कल ऐसा क्या हो गया था जो बेचैन हो रही थी ,अपने ही सवालों और जवाबों में कभी उलझती जाती और कभी संतुष्ट हो लेती.आज उसे अपने जीवन की तस्वीर किसी चलचित्र के मानिंद मानस पटल पर घूमे जा रही थी. वह यह भी देख पा रही थी कि कैसे उसका विवाह हुआ,कितने नाज़ों अरमानों से पाली वो बेटी आज अपने नए अरमानों के साथ अपना घर बसाने जा रही है. मन में नए रिश्ते के प्रति उत्सुकता एवं उत्साह लिए रीता जब घर संवारने लगी तो कई कटु एवं मृदु सत्यों की उसे अनुभूति हुई. रीता एक अतिसाधारण दिखने वाली प्रेमभाव से जुड़ी हुई परंतु परिवेश के अंतर ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया. जब कभी कुछ वह नया करती या किन्हीं कठिनाइयों से गुजरती तो एक प्रेम या करूणा के भाव के स्थान पर यही कहा जाता कि सिर्फ तुम्ही एक महिला नहीं बल्कि सभी महिलाएं ऐसे ही घर चलाती हैं. पर शायद पुरुष इस बात को कहने में यह नहीं सोचते कि जो कुछ रीता सोचती है, वैसी ही सोच लगभग सभी स्त्रियों की होती है .फर्क बस इतना होता है कि कुछ स्त्रियां रीता की तरह शांत हो जातीं हैं और कुछ अपने अस्तित्व के लिए खड़ी हो उठती हैं.

                 समय बीतता गया, रीता के बच्चे माँ की स्थिति को भली भांति समझते हुए अपने सुखद भविष्य की तैयारी में जोर-शोर से जुटे थे और साथ ही अपनी माँ को हंसी एवं सुखद भविष्य के सपने भी दिखा खुश रख रहे थे. आज बच्चे अपने पाँवों पर खड़े हो गए थे और गार्हस्थ जीवन में भी प्रवेश ले चुके थे. रीता का पति जो अब पिता के संग ससुर भी बन गया था, पिता होने के नाते बेटी को ससुराल में तनिक भी तकलीफ में पा कराह पड़ता और पत्नी से कह उठता_"कितने अरमानों से बच्ची को पाला पोसा कि राज करेगी, पर यह क्या???"  वहीँ वही पिता ससुर बन अपनी बहू की शिक्षा-दीक्षा, उसके संस्कारों के पुल बाँधने लगे और अपनी पत्नी ,बेटे को बहू को कुछ कहने से रोके,मन में एक टीस उठे कि दूसरे की बेटी है कहीं हमसे अन्याय ना हो जाए.

                    रीता आज इन्हीं बातों को सोच हैरान हो रही थी कि जब वह इस घर में आई थी तो शायद उसे भी इसी करुणा एवं प्रेम की आस थी, तब यह सोच कहाँ थी?

                सच्चाई शायद यहीं तक नहीं बल्कि पराकाष्ठा तब होती है जब वही बच्चे जो अपनी माँ को जीवन का प्रेरणाश्रोत मान सुखद जीवन तो जीते हैं परंतु अब उनके पास उस माँ को सोचने की फुर्सत कहाँ. तभी यह स्त्री मन पूरी तरह से टूट जाता है और उसकी तड़प, छटपटाहट जो प्राकट्य रूप लेता है वह ही जाने-अंजाने "सास-बहू के किस्सों" को अंजाम देती है जिसका हिस्सा बनना कोई स्त्री कभी भी अपने कल्पना में भी आने देना नहीं चाहती है.

*"बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ" के तहत सरकारें नियम बनाती रहें परंतु इसकी सफलता तभी हो सकती जब सोच में बदलाव हो.

Monday, 22 August 2016

छुई मुई

​ऐसी फूल  सी थी वो छुइ- मुई 

नजाकत भी खूब थी उसकी
हँसती - खिलखिलाती वो हरदम 

सुबह की ताज़ी - सी वो  धूप एकदम
गुन - गुनाना , चहचहाना , वो बातें बनाना 

 मासूम सी,वो प्यारी परी 
एक मुजस्सिमा है सरापा नूर की

एक बंद किताब  है मेरी जिंदगी की
जिंदगी तुझको तो बस ख्वाब में देखा हमने . 

क्या हकीक़त भी होती है इतनी हँसीं . 

@ Ajha . 19. 03. 16

कभी यूँ भी होता


​क्या अधिकार दूँ कि लब खामोश हो गये 

इन जज्बात की बातों में अल्फाज कहीँ गुम हो गये 
ऐ वक्त ज़रा तू भी तो ठहर कि 

इक पल को ज़रा मैं भी तो जी  लूँ . 
कभी यूँ भी होता गुजरती मैं उन गलियों से 

जो पस - मंजर मैं यार होता 
इक पल को ही सही 

मुझे उनका दीदार होता 
ना फ़िर होतीं कोई जिंदगी में चाहते 

इबादत ही  होती मेरी राहते  
ना फ़िर कोई चाह नेमतों की 

ना फ़िर कोई राह जेहमतों की 
ना कोई लम्स चाहिये , ना कोई तिशनगी कोई 

ना आरायिश ही कोई 
फ़कत इक पल का दीदार , इक इजहार 

और इक ख़याल कि इसी हाल में 

सुपुर्दे खाक हो जाता  .

सुपुर्दे खाक

सुपर्दे खाक

​क्या अधिकार दूँ कि लब खामोश हो गये 

इन जज्बात की बातों में अल्फाज कहीँ गुम हो गये 
ऐ वक्त ज़रा तू भी तो ठहर कि 

इक पल को ज़रा मैं भी तो जी  लूँ . 
कभी यूँ भी होता गुजरती मैं उन गलियों से 

जो पस - मंजर मैं यार होता 
इक पल को ही सही 

मुझे उनका दीदार होता 
ना फ़िर होतीं कोई जिंदगी में चाहते 

इबादत ही  होती मेरी राहते  
ना फ़िर कोई चाह नेमतों की 

ना फ़िर कोई राह जेहमतों की 
ना कोई लम्स चाहिये , ना कोई तिशनगी कोई 

ना आरायिश ही कोई 
फ़कत इक पल का दीदार , इक इजहार 

और इक ख़याल कि इसी हाल में 

सुपुर्दे खाक हो जाता  .

@ Ajha . 14. 03. 16

सुपुर्द ख़ाक

 ​ये बादे - बहार , 

ये रुस्वाइयों का आलम 

काश के नज़रें मिल जातीं  

मुनाज़िर  ज़रा देख लेते .

हाँ बहारें आईं थीं , संग खिजां भी लाई थीं 

ऐ दोस्त बहारों को इलज़ाम ना देना  

मौसम ही तो था , अपनी खुशियाँ दे गया 

ये नज़रों की अदला - बदली 

वो ख़ुशी ओ ग़म की आँख मिचौली 

रंगत भी है कुछ जुदा - जुदा 

चहुं ओर पसरा ये सन्नाटा  

लगता है फ़िर किसी  की मौत हो गई 

वो तो गहरी नींद सो गया पर 

फ़िर से जहान खुशियों में तब्दील हो गया

एक फ़कीर तन्हा जो आया था  

आज सुपुर्दे खाक हो गया . 

@ Ajha .06. 03. 16

हिचकियाँ

​हिचकियां आईं थीं मुझको 

हाँ , शायद वो फ़िर  याद आया . 

कहा करता था मुझसे , अब क्या लिखूं मैं कविता 

कल्पना में मेरी जो थीं बसती, वो मुझे था मिल गया 

मेरा औचित्य वही, जीवन आधार वही

वो ही है धूरी जिस पर कर रहा था वो परिक्रमा 

कुछ  समझ आता नहीं

ये ज़िंदगी भली या वो जो थी मृग तृष्णा 

आज  ज़िंदगी के मायने बदल गये 

कहता था कलतक वो जो कुछ भी मुझ से 

वही आज हो गई जीवन के उसके  हिस्सा 

कलतक जब ना था वो पास उसके

 थी पास उसकी कविता 

आज जब है दूर वो उसके

जीवन उसकी बन गई है कविता 

लोगों से अब पूछता वो फिरेँ _ 

क्यों जुदाई का सबब है ऐसा 

सारी दुनियाँ हो जाती है एक तरफ़ 

इक वैरागी ही क्यों रह जाता तन्हा 

प्रेम

प्रेम

​किस प्रेम की है तुझको आस , 
तुम्हीं बताओ मुझ को आज . 
प्रेम किसे तुम कहते हो ,

वो जिस वासना में डूबा संसार ? 
जो लिखे हुए  दीवारों - दरख्तों पर आज ? 
या प्रेम तुम्हें वो लगती है , जो 

भरी पड़ी है वरकों में , अल्फाजों में अफरात? 
दुनियाँ का तुम भरम ना पालो , 
माया - जाल के भँवर में फँस ना जाओ . 

सच्चा प्रेमी ऐसा है ,
संग चले दुनियाँ के ,
पर अन्दर उसके खुदा है . 

पानी जैसा निर्मल है वो , 
आकाश के जैसी सोच
दुनियाँ का वो सबसे प्यारा , 

खुद के लिये तन्हाई उसकी संगी है . 
पर याद करो जो उसको
चेहरे पे मुस्कान- सी छाई  है . 

यही हकीकत प्रेम की
इसे ही प्रेम माना है.
ऐसे ही संग में जीवन बिताना है@ Ajha . 27. 01. 16

Wednesday, 17 August 2016

सोच, आसमान की उड़ान में

हर बात में गहराई को आंकना
अच्छा लगता था
हिम्मत ना थी
उंचाईयों को सोचने की
खुशियों की उम्र थी
लंबी इस कदर ,यह सोच कर
हमसे भी नीचे की दुनिया है
जीना तो है बस सहर भर
नसीब में रोटी तो है शाम ओ सहर
नींद को भी कहाँ चाहिए थी शाही बिस्तर
कई चांदनी रातों को निहारे
कितनी ही  बातें  की थी हमने
और की थीं मिन्नते चाँद से
काश! कि तुम जमीं पे होते
या उड़न तश्तरी पे होकर
तुम तक हम जा पहुँचते
कितने थे प्यारे ये सपने,
यूँ ही रात गुज़र जाती
ख्वाब में ही सब बात निपट जाती
आज ये क्या हुआ!
उड़न तश्तरी था सामने तैयार खड़ा 
आकाश में उड़ने ,
बादलोँ से बातें करने का
था फरमान हुआ
मान ली हुकूमत को
कमर  भी कस लिया अपना
ख़्वाबों में जो था सपना
सच हो गया आज वो सपना
विस्मित थी
पर यह क्या !क्यों मुझे
हरी -भरी धरा अपनी प्यारी लगने लगी
श्वेत , धवल, नीलाभ यह अब  क्यों
बदरंग से लगने लगे
मिथ्या ही था सब अब तक
मृगतृष्णा बन जो सताती रही
ख्वाहिश चाँद से मिलने की तब्दील हो गई
सच में दूर के ढोल सुहाने होते हैं
ऐ ज़मी तू ही जन्नत है, तू ही हकीकत
ख्वाब भी तूँ,
इन्तख़ाब भी तूँ ही
तूँ ही हूर और और देवी  भी तूँ
'सत्यम, शिवम्, सुंदरम 'की सार्थकता.
समस्त ब्रह्माण्ड की तुझसे ही है व्यापकता तभी है तेरी इतनी महत्ता.
और नमन है तुझको हम सबका.

डोर (रक्षा बंधन के बहाने)

रक्षा बंधन की डोर
रेशम से बनी बेजोर
दिखने में कितनी ही कमजोर
कई रिश्तों से बंधी
है बस यही जिंदगी
इक बार जो देखा इसे
कई गाँठ थे लगे
दाग भी थे और कई
फरेब और ठगी की थी किस्सागोई
बेजुबान थी लाचार भी
पर ये क्या!
कलाई पर ज्यों ही बंधी
एक ताकत की अनुभूति हुई
वो जो कई गांठें थी
अब सम्मान है
एकजुटता का निगहबान है
सपना है ,अपना है
हकीकत है
हाँ ,कुछ पल के लिए सोच में
घुन लग गया था
अहंकार में रम गया था
आँखें जो खुली
सब कुछ थी वहीँ के वहीँ
वो रिश्ते, वो सपने
और सभी तो थे मेरे अपने
बंधे एक नाजुक सी डोर से.

Sunday, 24 July 2016

aaj mujhe apne bachpan ki yaad subah se aa rahi thi. tab kitaaben hi zyadatar manoranjan ka saadhan  huaa kerti thi.ya fir kisine koi cinema ya tv serial dekha ho to oose saamne  me  baitha ker vakta bana diya jata tha aur fir baki ke log shrota ho jaate the. yah karykram ka sisila ghar me bhai bahno ke beech me aur school me doston ke saath chalta tha. dosti ki koi shart nahi hoti thi bus jahan kisi ne kahani sunani shuru ki aur bachche jurte jaate the .her ek ke paas os kahaani ka jor tor hota tha .bas kya tha kahani me paatr bdhta jaate aur idhar doston ki sankhya badhti jati. hamare kahaniya harivansh rai bachchan, munshi premchand se leker shammi kapoor,devanand .oos samay ki nayee filme ityadi per aadharit hua kerti thi.jagjeet singh ke gazal bhavuk banaya kerte the.aaj ke bachche aur hum apne bachpan ko dekhe to aisa lagta hai ki ye kabhi bachche ho hi nahi paaye. ya fir ye bhi ki vighyan aur taqniqui jagrukta ne bachpan ki paribhasha badal daali hai.

Friday, 22 July 2016

रूठना कैसा

समझाने कि अदा क्या भाई
वो रुठने का शौक फ़रमा रहे

कई दफ़े हँसाया था मैंने,पर
ना समझने की कसम खा रहे

बताया भी ना आने का सबब
मज़बूरी को बहाने बता रहे

बहुत मुमकिन था मान जाना उनका
पर बैठ किनारे तूफां का नज़ारा कर रहे

अब ना होगा मुझसे ये रुठने-मनाने का खेल
मेहरबानियों पे उनके हम जिए जा रहे हैं

Thursday, 21 July 2016

क्या साहित्य महारथ होने के लिए डिग्री की आवश्यकता है

           आज का समाज इतना जागरूक हो चला है कि इसकी पैनी नज़र लोगों के हर पहलू पर होती है.सोशल  मीडिया का योगदान भी इसमें कम नहीं. आज चाहे आप जिस भी विषय पर राय शुमारी कराना चाहे, मुख पोथी पर पोस्ट करें और संतोषजनक परिणाम की आशा अल्पावधि में भी पा सकते हैँ. आज हमारा साहित्य जगत जिन उचाईयों को देख रहा है, वह भी सोशल मीडिया के वाइरल से अछूता नहीं. अब सभागारों और बंद कमरों गोष्ठियों और सेमिनारों के साथ मुख पोथियों पर भी साहित्य चर्चाएं हो रही है. इसमें होने वाले बदलावों पर भी अनेकों प्रकार से अनुभव साँझा किये जा रहे हैँ. ऐसी ही एक चर्चा का विषय  " क्या साहित्य और खासकर कविता लेखन में डिग्री प्राप्त करना अनिवार्य है? "
                हालांकि मैं इस विषय की विशेषज्ञ तो नहीं पर बहुत कुछ अनुभव भी सीखा जाती है या यूँ कहिये कि परिपक्वता भी व्यक्ति में एक मत कायम करते रहती है, और इसी आधार पर मेरी भी सोच है.जहाँ तक मुझे लगता है साहित्य और कला (चाहे कोई भी विधा हो) एक प्रकृति प्रदत्त वह हुनर है जो हम में जन्म के साथ ही होती है. आवश्यकता उसके तलाशने और तराशने की होती है. जैसा आप तराशेंगे वैसा ही उसमें निखार पाएंगे, और मैं समझती हूँ की इसके लिए किसी डिग्री की नहीं अपितु खुद को उस विधा में लगन के साथ झोंक देने की आवश्यकता होती है.
                      जहाँ तक डिग्री का सवाल है वह विषय के तराशने नहीं अपितु संवारने के लिए आवश्यक है जिसे हम शोध कहते है. किसी भी साहित्यकार चाहे वो कवि हो या और कुछ ,वह अपने अंतर्मन को मूर्त रूप देता है और उसके लिए इसकी गुणवत्ता का बखान करना कठिन होता है. ये शोधकर्ता होते हैं जो अपनी विद्वता के अनुसार काल, देश, और श्रेणी में वर्गीकृत करते हैँ. एक कलाकार  या साहित्यकार अपनी कल्पना और अनुभव को जीता है और जो कुछ भी उससे शब्दों अथवा अन्य मूर्त माध्यम से दृष्टिगत होते है ,वह ,उसे ठीक उसी प्रकार से प्रिय होता है जैसे एक पिता या माता से यह बता पाना कि उसका कौन सा संतान उसे सर्वाधिक प्रिय है.
           अतः इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह बहुत आवश्यक है कि नवोदित सृजनात्मक प्रतिभा को हमेशा खुले दिल से और आवश्यकता अनुसार समालोचना से उत्साहित और प्रेरित किया जाय.@Ajha.