Monday, 29 February 2016

मेरे हमसफ़र , मेरे हमनवा

ये कविता मेरे कविता लेखन के शुरुआती दिनों के हैं. एक दिन पतिदेव अनायास ही बोल पड़े की कभी हमारे लिये भी तो लिखो , तब जो शब्द मेरी लेखनी ने कविता की नज़र किये वो यही थी जो आज मैं सान्झा आप से कर रहीहूँ .
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  हमारी दास्तां
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मेरे हमसफ़र , मेरे हमसफ़र
मुझे आ रही है तुझ से सदा
आ ज़रा मेरे पास आ
मुझे सुननी है तूझसे
हमारे इश्क की दास्तान
ये ना था कोई इत्त्फाक
ना थी ये कोई इश्क की दास्तां
ना इशारों की कोई बात थी
जहाँ हमसे थे तुम आशना
वो शादी की रात थी
शहनाई की गूँज ने दी थी ये इत्तला
आज तुम्हें मिल गया
तेरा हमनशीं , तेरा हमनवा .
जिंदगी की रस्में भी कुछ अजीब हैं
चलना तो था हमें साथ साथ
पर बैठे थे जुदा - जुदा हम उस रात
ना था हमें पता कि
जिंदगी ने लिया था क्या फ़ैसला
जिंदगी की रवानगी में
ये क्या मुझे हुआ
क्यों काँप उठी थी मेरी वफा
पर तभी मुझे तुमने था थाम लिया
इश्क ने हमारे रुप था लिया नया 
जहाँ फ़कत हम थे और थीं हमारी वफा
ये इश्क की है ऐसी दास्तां .
जहाँ आगाज का तो हुआ पता
अंजाम भी होगा वल्लाह - वल्लाह
बिसमिल्लाह - बिसमिल्लाह .
@ Ajha . 23. 02. 16

सजदा

सुप्रभात . आज दिल बस इतना ही कहना चाहता है _

सनम तेरी ही आरजू किया करेंगे
सूरज - चन्दा को यह कह कर छेड़ा करेंगे
आजा तू भी देख मेरे महबूब को
अब ना तेरे आगे सजदा करेंगे .
@ Ajha . 24.02. 16

इंतज़ार और अभी . . .

कांटों की चुभन

कांटों की चुभन
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फ़िर बैठी हूँ सोचने
काश की कोई पत्थर पिघल जाता
बारिश में बरसते शोले
फ़िर से पानी में लग जाती आग
रूह से रूह तो मिलाई
ज़माने भर का ग़म देकर
फ़िर क्यों दी संग तुमने जुदाई
ये कैसी है तेरी खुदाई
फ़िर से मुझे वो मिलन की रात याद आई .
@ Ajha . 26. 02. 16

सम्बंध

मुझे लगता है कि कुछ - कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो हमें इतने सुकून और इत्मीनान बख्श होते हैं कि हम यह सोच ही नहीँ पाते कि जिसके लिये हम ने एक जहाँ बना रखा है वो  कहीँ रेत के मकान में तो नहीँ बैठा . इसलिये ज़रूरत हमेशा इस बात की होती है कि  रिश्ते में ताजगी बनाई रखी जाये , उसे बासी होते ना छोड़ा जाय . रिश्ता जिसे हम बहुत मज़बूत मान बैठते उसकी एक सच्चाई यह भी है की वह उतनी ही नाजुक भी होती है जिसका हमें ख़याल रखना चाहिये , वरना रिश्ते की नींव हिल जाती है . शायद शायर ने भी इस स्थिति को महसूस किया हो और चंद अल्फाज अनायास ही निकल आये हों _ 

हम को उन से  वफा की है उम्मीद
जो नहीँ जानते वफा क्या है
                   - - - मिर्ज़ा ग़ालिब .

या फ़िर यूँ कहे _

ना गुल खिले , ना उन से मिले , ना मै पी है 
वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र ना था
वो बात उनको  नागवार गुजरी है .
                - - - - - फैज अहमद फैज.

@ Ajha . 26. 02. 16

वो जिसका ना था जिक्र

वो जिसका ना था जिक्र कोई हमारी बातों में
ज़माने भर की सरदर्दी लेली उसने
किसी के बहकाने में
अपनी तो नींद ही उड़ गई
तेरे फसाने में .
@ Ajha . 26. 02. 16
#KaafiyaMilaao .

कसीदाय

ये आँसुओं का मोल क्या जाने पत्थर दिल वाले
उम्र  गुजार दी उनको समझाते समझाते .
@ Ajha

याद

चेहरे पे ख़ुशी जुबां पे हँसी
तन्हाई में भी इक नूर सी दिखाई दी है
बदले - बदले से नज़ारे हैं .
शायद तेरी याद आई है .
@Ajha . 26. 02. 16

अफ्सुर्दा

तेरी बातों से अफसुर्दा
तेरी वादों से अफसुर्दा
तेरी लम्स से अफसुर्दा
तेरी तन्हाई अफसुर्दा , अफसुर्दा
तो बता ऐ जिंदगी _
हम जिये तो कैसे जिये .
@ Ajha . 27. 02. 16

अफसुर्दा _ sadness
लम्स       - touch

इलज़ाम

@ Archana Mishra

बातें जो हैं अफ्सुर्दा , अफ्सुर्दा
कर दो उन बातों  को बेपर्दा
वरना इलज़ाम ये हम पे होगा
कि कर दिया कायनात को अफ्सुर्दा .
@ Ajha . 26. 02. 16

अफ्सुर्दा : sadness

हुस्न

Manjulaji _
जल जाने दो  हुस्न से कायनात को
क्यों रहे हुस्न पोशिदा
इसी बहाने से सही
पैगामें मुहब्बत दुनियाँ में छा जाये .
@ Ajha . 26. 02. 16

आँसू

उन्वान - 109
शीर्षक - आँसू /अश्क /अश्रु

रुखसती जो हुई उसकी बहुत रोया
आज महबूब के आने की ख़ुशी में है खोया
आँसुओं के संग जज्बातों को क्या खूब पिरोया
या मौला ! कितनी शहादतें और इन अश्कों की तूँ  लेगा . @ Ajha . 28. 02. 16
Aparna Jha

Rukhsati jo hui uski bahut royaa
Aaj mahboob ke aane ki khushi me hai khoya
Aansuon ke sang jajbaaton ko kya khub piroyaa
Ya maula ! kitni shahaadaten aur in ashkon ki tu legaa .
@ Ajha . Aparna jha .

कवि मित्र

हम housewives के लिये सप्ताहंत के दिन weekdays के रुप में होते हैं जहाँ office goer members of the family holiday enjoy करते हैं , उस holiday को सुंदर बनाना हम house wives का काम होता है . पर इन gaps में मित्रों की शिकायतें बढ़ जातीं हैं. जैसा की एक मित्र ने फरमाया _

" जल रहा है हिन्द वो बेखबर , उसे तो बस अपनी शोहरत चाहिए_ "

इसमें मेरा जवाब तो लाजिमी है _

" यहाँ आशियां बुनते - बुनते गुज़र रही हैं शामों शहर
और एक हुजूर हैं जिन्हें हर बात में शोहरत नज़र आती है "
@ Ajha 28. 02. 16

कल रात वो गा रहा था . . .

किसी के time line पर एक line पढ़ा था 'कल रात वो गा रहा था ' बस उसी पर ही ये poetry लिखी थी . अपनी पिछ्ली कविताओं में खुद को झांकने का मन किया सोचा आपसे भी साझा कर हीलूँ

गुजिश्ता शब की  बात है
भर शब कोई गा रहा था
मानो किसी को वो बुला रहा .
समा भी ऐसी , मानो ,
चाँदनी भी शरमाई - सी ,
काली घटा बादलों में मुस्काई -सी
आहटें , ऐसी कि किसी के आने से ,
सहम गई नार कोई दीवानी -सी .
गीत की तास्सिर  ऐसी , मानो
नार - दीवानी मंद-मंद - मस्त चाल से
अपने दीवाने के तार पर चली आ रही .
हवाओं की शीतलता ,
उसे घूंघट ओढा रही ,  मानो
सबकी नज़र से उसे बचा रही  .
इतनी वो प्यारी शब , मानो
मुझे भी अपनी गुजिश्ता याद करा रही .
जैसे - जैसे सुर - लहरियाँ
मेरे कानों तक आने लगी , मानो
कोई बिसरी - सी कोई , सामने मुस्कुराने लगी .
जितनी भी चाह रहा उसे भूल जाना  ,
क्योंकर वो मेरे क़रीब आ रही थी  .
वो जो गा रहा था , शायद
अपने दिल की गुनगुना रहा था .
शायद अपने भी तार कुछ मिल रहे थे
तभी तो उन तानों पर ,
मैं भी खींचा चला आ रहा था , मानो
अपने अजीजो - जान को मना रहा था ,
ना जाने किस बात से मैं
वाबस्ता हुआ जा रहा था .
कैसी वो रात आज भी मानो
वैसे ही यादों में बसी है
पसे चश्म यूँ ही नाचती है .
@ Ajha . 29. 02. 16