Sunday, 24 July 2016

aaj mujhe apne bachpan ki yaad subah se aa rahi thi. tab kitaaben hi zyadatar manoranjan ka saadhan  huaa kerti thi.ya fir kisine koi cinema ya tv serial dekha ho to oose saamne  me  baitha ker vakta bana diya jata tha aur fir baki ke log shrota ho jaate the. yah karykram ka sisila ghar me bhai bahno ke beech me aur school me doston ke saath chalta tha. dosti ki koi shart nahi hoti thi bus jahan kisi ne kahani sunani shuru ki aur bachche jurte jaate the .her ek ke paas os kahaani ka jor tor hota tha .bas kya tha kahani me paatr bdhta jaate aur idhar doston ki sankhya badhti jati. hamare kahaniya harivansh rai bachchan, munshi premchand se leker shammi kapoor,devanand .oos samay ki nayee filme ityadi per aadharit hua kerti thi.jagjeet singh ke gazal bhavuk banaya kerte the.aaj ke bachche aur hum apne bachpan ko dekhe to aisa lagta hai ki ye kabhi bachche ho hi nahi paaye. ya fir ye bhi ki vighyan aur taqniqui jagrukta ne bachpan ki paribhasha badal daali hai.

Friday, 22 July 2016

रूठना कैसा

समझाने कि अदा क्या भाई
वो रुठने का शौक फ़रमा रहे

कई दफ़े हँसाया था मैंने,पर
ना समझने की कसम खा रहे

बताया भी ना आने का सबब
मज़बूरी को बहाने बता रहे

बहुत मुमकिन था मान जाना उनका
पर बैठ किनारे तूफां का नज़ारा कर रहे

अब ना होगा मुझसे ये रुठने-मनाने का खेल
मेहरबानियों पे उनके हम जिए जा रहे हैं

Thursday, 21 July 2016

क्या साहित्य महारथ होने के लिए डिग्री की आवश्यकता है

           आज का समाज इतना जागरूक हो चला है कि इसकी पैनी नज़र लोगों के हर पहलू पर होती है.सोशल  मीडिया का योगदान भी इसमें कम नहीं. आज चाहे आप जिस भी विषय पर राय शुमारी कराना चाहे, मुख पोथी पर पोस्ट करें और संतोषजनक परिणाम की आशा अल्पावधि में भी पा सकते हैँ. आज हमारा साहित्य जगत जिन उचाईयों को देख रहा है, वह भी सोशल मीडिया के वाइरल से अछूता नहीं. अब सभागारों और बंद कमरों गोष्ठियों और सेमिनारों के साथ मुख पोथियों पर भी साहित्य चर्चाएं हो रही है. इसमें होने वाले बदलावों पर भी अनेकों प्रकार से अनुभव साँझा किये जा रहे हैँ. ऐसी ही एक चर्चा का विषय  " क्या साहित्य और खासकर कविता लेखन में डिग्री प्राप्त करना अनिवार्य है? "
                हालांकि मैं इस विषय की विशेषज्ञ तो नहीं पर बहुत कुछ अनुभव भी सीखा जाती है या यूँ कहिये कि परिपक्वता भी व्यक्ति में एक मत कायम करते रहती है, और इसी आधार पर मेरी भी सोच है.जहाँ तक मुझे लगता है साहित्य और कला (चाहे कोई भी विधा हो) एक प्रकृति प्रदत्त वह हुनर है जो हम में जन्म के साथ ही होती है. आवश्यकता उसके तलाशने और तराशने की होती है. जैसा आप तराशेंगे वैसा ही उसमें निखार पाएंगे, और मैं समझती हूँ की इसके लिए किसी डिग्री की नहीं अपितु खुद को उस विधा में लगन के साथ झोंक देने की आवश्यकता होती है.
                      जहाँ तक डिग्री का सवाल है वह विषय के तराशने नहीं अपितु संवारने के लिए आवश्यक है जिसे हम शोध कहते है. किसी भी साहित्यकार चाहे वो कवि हो या और कुछ ,वह अपने अंतर्मन को मूर्त रूप देता है और उसके लिए इसकी गुणवत्ता का बखान करना कठिन होता है. ये शोधकर्ता होते हैं जो अपनी विद्वता के अनुसार काल, देश, और श्रेणी में वर्गीकृत करते हैँ. एक कलाकार  या साहित्यकार अपनी कल्पना और अनुभव को जीता है और जो कुछ भी उससे शब्दों अथवा अन्य मूर्त माध्यम से दृष्टिगत होते है ,वह ,उसे ठीक उसी प्रकार से प्रिय होता है जैसे एक पिता या माता से यह बता पाना कि उसका कौन सा संतान उसे सर्वाधिक प्रिय है.
           अतः इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह बहुत आवश्यक है कि नवोदित सृजनात्मक प्रतिभा को हमेशा खुले दिल से और आवश्यकता अनुसार समालोचना से उत्साहित और प्रेरित किया जाय.@Ajha.

Monday, 18 July 2016

साहित्य : कब और कैसे

        मानव मस्तिष्क एक ऐसे सोच का कीड़ा है जो हमेशा कल्पनाशील और सृजनात्मकता की खोज में रहता है. हर नई सोच को पुरानी सोच में मिला, गुण- अवगुण की समालोचना करते हुए ना जाने कब एक नई सोच का सृजन कर लेता है जो तात्कालिक समाज में परिलक्षित होते रहता है.
          साहित्यिक सृजन का इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है.पहले  चित्रात्मक अभिव्यक्ति और फिर शब्दात्मक अभिव्यक्ति_यह शुरुआत थी साहित्यिक उद्गम का, जिसे हम इतिहास, कला, संस्कृति और समाज का लिखित प्रमाण मानते हैं.
              जैसे-जैसे समाज का विकास होता गया कालान्तर में काल विभक्ति भी इसी प्रकार से होने लगी और साहित्य पर पड़ने वाले प्रभाव को भी इसी आधार पर वर्गीकृत किया गया. आदि काल से वैदिक काल तक समाज प्रकृति का उपासक था और तब का साहित्य भी इसी विषय पर आधारित था, भाषा संस्कृत. परंतु उत्तर वैदिक काल अंध विश्वास, कर्मकाण्डो से प्रभावित होने लगे , आम जनजीवन एक नए जीवन सूत्र के तलाश में थी.और इसी तलाश का नतीजा जैन, बौद्ध धर्म और अनेकों माध्यम मार्गीय   व्यवस्था के पनपने से साहित्य पर भी प्रभाव हुआ .संस्कृत भाषा टूट कर पाली,अपभ्रंश हो गई और इसी भाषा में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के  ध्यान में रख साहित्य लेखन करने लगे.
                मध्यकालीन भारत ,जिसमें खास कर मुग़लों का खासा प्रभाव देखा गया. इस काल में दो भाषाओं का जन्म हुआ .अपभ्रंश भी टूटी . अब खड़ी बोली ,जिसने बाद में हिंदी का रूप लिया और उर्दू भाषा.उर्दू  'उर्द' शब्द जिसका अर्थ तम्बू है और तम्बुओं में रहने वाले मुग़ल और यहां के स्थानीय निवासी में संपर्क बनाने के लिए थोड़ा फ़ारसी और थोड़ा खड़ी बोली मिला कर जो बोली गई वही आगे चलकर  उर्दू जबान हो गई. इस काल ने दरबारी साहित्य देखा जहाँ राजा के प्रशंसा में कसीदे पढ़े गए तो कई साहित्य इतिहास के रूप में दिखे और जो महत्वपूर्ण दिखा वो था सूफी साहित्य.
                अंग्रेजों की गुलामी झेलते समाज ने कई साहित्यिक आयाम जोड़े.देशभक्ति विषय को समझाने के लिए अनेकों विदेशी साहित्यों का अनुवाद एवं प्रभाव दिख पड़ा. साथ ही लोगों में जागरूकता लाने के लिए पहली बार अपने पुराने संस्कृति एवं धर्मग्रंथो का गुणगान हुआ. इससे पूर्व के  इतिहास में इन बातों पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया.
                     अगर समसामयिक साहित्यों की बात करें तो स्वतन्त्रता के पश्चात रूस की भारत से प्रगाढ़ मैत्री से उनके कई सिद्धान्तों का असर हमारे साहित्य में मिलता है और जिसमें मार्क्सवादी विचारधारा प्रमुख है.
                     शनैः शनैः बाज़ारवाद के बढ़ते कदम ने लोगों में साहित्य के प्रति एक उदासीनता भर दी और इस कारण यह सेमिनार एवम् गोष्ठियों का विषय बन बंद कमरों एवं कुछ लोगों तक सिमट कर रह गया.
                  आज सोशल मीडिया का योगदान ऐसा प्रभावी माध्यम हो चला है जिसके जाल से बच पाना असंभव है. यहाँ समाज की इच्छा-अनिच्छा की प्रमुखता नहीं बल्कि विषय कुछ भी हो इसे रुचिकर, रोमांचकारी और आकर्षक बना लोगों की नज़रों तक ऐसे पहुँचा दिया जाता है कि  लोग अपनी भावना एवं सहभागिता जाने अनजाने में प्रकट कर जाते हैं और इसी से प्रभावित है हमारा आज का साहित्य जो सम्प्रति लोकप्रियता की ऊंचाईयों को छू रहा है. मुझे लगता है कि अभिव्यक्ति की जितनी आज स्वतन्त्रता है इस कारण साहित्यिक क्षेत्र विविधताओं से भरा है.ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय समाज जिस लोकतंत्र को जी रहा है ,वह देश और दुनिया के लिए एक उदाहरण और हमारा साहित्य उसकी एक मिसाल है.@Ajha,.18.07.16
         
               

बरखा बरसि रही

http://wp.me/p7Dq43-1R