Monday, 30 January 2017

बुद्धम शरणम गच्छामि

"बुद्धम शरणम गच्छामि"

अजब था वो माहौल बड़ा
समाज कोलाहलों के बीच पड़ा
तब राजतंत्र की बातें थीं
निरंकुशता की सौगातें थीं
अतिवादी का वो दौर बड़ा
दकियानूसी से भरा पड़ा
छोड़ राज -पाट और मोह को
वो 'राजकुमार' धर्म की राह चला
दिव्य ज्ञान  जो उसने पाया
'गौतम बुद्ध ' वो कहलाया
'मध्यम मार्ग ' का लोगों को
जो सूत्र उसने बतलाया
कत्लो-गारत करने को'अँगुलिमाल'
भी बौध्द भिक्षु बन बैठा कह कर
"बुध्धम् शरणम् गच्छामि "
सांसारिक सुखों से भरा पड़ा
सम्राट 'अशोक' था नाम जिनका
ना रास आई जीवन की नीरसता
लेकर संग अपने वो काफिला
धर्म की राह पर चल निकला
"बुध्धम् शरणम् गच्छामि "
हे बुध्द ! आज फ़िर देश
तुझे है बुला रहा
भौतिकता की अतिवादी में
असहिष्णुता की राह
पर  है देश है चल पड़ा
सूत्र भी तेरे अब कमज़ोर पड़े
आ फ़िर से एक बार आ
लोगों को फ़िर से
अपना वो सूत्र बता
देश तरक्की पर चल जाये
लोग खुशियों में रम जायें
मध्यम मार्ग का बस यही
एक  सूत्र रहे _
"बुद्धम् शरणम् गच्छामि "
@Ajha.31.01.16
स्वरचित,मौलिक रचना
©अपर्णा झा.

गुड़िया

"गुड़िया"
(आज के विषय पर आधारित कविता)

गुड़िया से मेरा प्यार पुराना
ये तो थीं मेरे दिल का नज़राना
एक अम्बार गुड़ियों का
घर में था सज़ा लिया
बोलती हुई गुड़िया
डोलती हुई गुड़िया
जी हुजूरी वाली गुड़िया
जो आँखों में बसा ली
अब दिल में थी उतर आई
सच की गुड़िया से
विवाह रचा लिया
कुछ दिन तलक वो
गुड़िया सी लगी
फिर बाद में वो बोलने लगी
आज़ादी की वो सोचने लगी
इंसान जो ठहरा मैं अहंकारी
कैद की गुड़िया थी मुझे प्यारी
लगने लगी अब वो भारी
खिलौने वाली गुड़ियों से भी
दिल भर गया
अब आवारा सा रास्तों पे
भटक रहा
गुड़ियों से इंसान सी ख्वाहिश
और फिर इंसान से
गुड़ियों सी ख्वाहिश
कैसा तूँ रक्षक इसका
कैसी तूने लीला रचाई
जो सोच ना सका
कभी इसकी भलाई
@Ajha.30.01.17
स्वरचित, मौलिक रचना
©अपर्णा झा

मेहरबानी

     आज गुड्डू ठीक एक साल का हो गया और ठीक एक साल बाद ही आये हैं उसके ललित मामा.गुड्डू की दादी ना जाने मन ही मन  कितनी ही दुआएं दे रही थीं ललित को.
"ललित बेटा ,क्या जरुरत थी इन तोहफों की???
पहले ही तुमने हमारे लिए कम किया है क्या!!!!"
        दुबला पतला सा एक युवा जो कि गुड्डू की माँ का दूर के रिश्ते में भाई था. बचपन में माँ-बाबूजी की गरीबी से मजबूर हो दिल्ली भाग आया था. आजादपुर सब्जीमंडी में एक फल के होलसेल विक्रेता के यहाँ फल की पेटी ट्रक पर चढाने -उतारने की उसे नौकरी मिली. जैसे जैसे वह बड़ा होता गया ,अपनी ईमानदारी से अपने मालिक का विश्वासपात्र होता गया.वह मालिक का बही खाता से ले सामान की हिसाबदारी सभी देखने लगा.बदले में मालिक ने उसे घर, बीवी बच्चों के लालन-पालन सभी का जिम्मा ले लिया था.
ललित अपने माँ बाबूजी को बेहद प्यार करता था.
एक बार जब उसकी माँ  कैंसर के बिमारी से पीड़ित हुई. डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी थी.ललित ने जैसे-तैसे पैसों का तो इंतज़ाम कर लिया था. अंग्रेजी नहीं समझ पाने के कारण वह डॉक्टर की बहुत बातें समझ नहीं पाता.आप्रेशन की जो भी तारीख मिलती , वह या तो उससे पहले पहुंचता या बाद में. परेशान हो एक बार वह गुड्डू की नानी के यहां पंहुचा. शीला (गुड्डू की माँ)का तब विवाह नहीं हुआ था.ललित ने डॉक्टर से बात करने हेतु , शीला से अपनी मां के लिए उसका वक्त माँगा था.शीला ने उसके कहे अनुसार अपनी नौकरी सके दिन की छुट्टी ले ली थी.
आप्रेशन के दिन शीला पूर्ण रूपेण वहां उपस्थित रही. भली-भांति डॉक्टरों से बातें भी कीं. आप्रेशन हो भी गया परन्तु ललित की माँ बच नहीं पाई.
          इस घटना के तीन साल हुए थे. शीला की भी शादी हो गई . ललित को जब शीला के गर्भवती होने की बात पता चली तो उसने  पूरे नौ महीने तक बिना पैसे लिए उसके ससुराल फलों की टोकरी पहुचवाता रहा. और आज.....
ना जाने फिर से ठीक एक साल बाद गुड्डू के जन्मदिवस पर अपने आशीष और तोहफों संग उनकी खुशियों में शामिल है.....

Friday, 27 January 2017

आज़ादी

-बेटा उठो, सुबह हो गई है...

-और फिर बाबूजी के साथ फसल भी काटना है.

-माँ मुझे खेत नहीं जाना, थोड़ी देर सोने तो दे.
-नहीं खेत तो तुम्हे जाना ही होगा, चलो उठो.
     तभी पास के स्कूल से वंदे मातरम की धुन सुनाई देती है .....
-अरे मुझे तो उठना ही होगा.
-आज तो स्वतन्त्रता दिवस जो है!!!
-बेटा तो हमें इससे क्या मतलब????
-अरे माँ तूँ कब समझोगी! आज स्कूल में गाना      बजाना होगा ,झंडा फहराया जायेगा.
-और जानती हो माँ आज हमें भरपेट खाना और मिठाई भी खाने को मिलेगा.
-आज हमें एक तिरंगा झंडा भी मिलेगा.आज हम सभी बच्चे अपने झंडे ले अमराई में खेलेंगे भी.... बहुत मज़ा आएगा.
-बहुत बोल लिया.चल जल्दी से अब नहा धोकर बाबूजी का नाश्ता लेकर जा. वो बड़े मालिक का खेत जोत रहे हैं.
-और हाँ, एक बात कान खोल कर सुन ले , जश्न हमारे नसीब में नहीं. हमें मेहनत करनी पड़ती है तब जाके कहीं दो जून की रोटी नसीब होती है...
-चल जा अब जल्दी कर....

Monday, 23 January 2017

झुक गया आसमान

-अरे ललित तुम यहाँ !
-कब आये लंदन से ?
-बस एयरपोर्ट के रास्ते सीधे तुम्हारे स्कूल ही आ   रहा हूँ.
-ऐसी भी क्या जल्दी थी ?घर जाकर थोड़ा आराम कर लेते ,तब तक मैं भी स्कूल से वापिस लौट आई रहती. इतना लंबा सफर.... थक तो गए ही होगे.
- नहीं थका हूँ ,मैं जिस कारण से यहां आया हूँ , तुमसे मिलना मेरे लिए बेहद जरुरी था. बस अब तुम आज की छुट्टी ले मेरे साथ रहो. मुझे तुम से कुछ जरुरी बातें करनी है.
-और  ये ! ये तुमने अपनी हालत क्या बना रखी है?
श्वेत साड़ी, मोटे फ्रेम का चश्मा ,क्या हो गया है तुम्हे?
-अच्छा छोड़ो ये सब. तुम्हार यहां आने का प्रयोजन तो बताओ?
-हाँ रंजना, तुम से विदा ले जब मैं उच्च शिक्षा के लिए लंदन गया ,इस वादे के संग कि व्यवस्थित होते ही तुम्हें अपने साथ विवाह कर ले जाऊंगा.
पर वहां,  तुम्हारे अधूरेपन ने मुझे जेस्सी से मिला दिया.
- जेस्सी से विवाह कर ,माँ से आशीर्वाद लेने जब यहां आया था, तुम्हें मिलाया भी तो था उससे....
-बिलकुल स्वभाव में तुम्हारी ही तरह .....
- हाँ ललित, बड़ी प्यारी सी परी है वो. कैसी है वो अब!!!
- रंजना कुछ भी ठीक नहीं. जेस्सी का तुमसे  मिलना ,प्रभावित होना और मेरी हालत कुछ भी तो उससे छिपी नहीं है. बहुत जिद्दी स्वाभाव की है जेस्सी.जिस बात का जिद्द लगा बैठती है उसे पूरा करके ही छोड़ती है. और अब वह जिद्द लगा बैठी है कि मैं तुम्हें ब्याह कर अपने पास ले आऊँ.
-रंजना क्या तुम जेस्सी के इस जिद्द को पूरा करोगी.मेरी खातिर ना सही जेस्सी के लिये तो मान जाओ.
-ललित,  बचपन से ही मैं तुम्हारे साथ पली बढ़ी,पर तुम्हारे साथ का अहसास दसवीं कक्षा में ही हुआ था.तबसे सर्वस्व मैंने तुम्ही को माना. तुम लन्दन गए,उन्ही दिनों इतिहास में मैंने अपनी पीएचडी कर डाली.मुझे प्रोफ़ेसर की नौकरी भी मिल गई थी.
-जानते हो , जब तुमने अपनी और जेस्सी की बात बताई, धक्का तो मुझे बहुत जोरों का लगा था. सर्वस्व त्याग चुकी थी मैं ,परन्तु मेरे अंदर का आत्मबल मुझे टूटने से बचा लिया.तभी मैंने प्रण ले लिया था कि स्कूल के 10वीं कक्षा की बच्चियों को ही इतिहास पढ़ाऊंगी ,तब से ये बच्चियां ही मेरी रंग-बिरंगी दुनिया हो गईं.इतिहास पढ़ाने का लक्ष्य भी तो यही सोचा था कि बच्चो में जैसे भी हो  आत्मबल पैदा कर पाऊँ ताकि बीते पल की कमजोरियों इन बच्चों पर कभी हावी ना हो.
-ललित ,अब तुम ही बताओ, अपने बनाये हुए इस दुनिया से निकल कर जीना क्या तुम से ,या अपने अस्तित्व के साथ न्याय कर पाउंगी?????
आज ललित के संग रंजना का ये रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपनी धरा से मिलन की खातिर जैसे "झुक गया हो आसमान."

Monday, 9 January 2017

बदगुमानी

"अरे तुम कब आईं  और ये छोटा बच्चा कितना प्यारा है...अभिव्यक्ति ने आकृति से पूछा . आज अभिव्यक्ति और आकृति शायद 24-25 साल के बाद मिले थे.
"नहीं-नहीं ,यह ना तो मेरा नाती है ना ही पोता.
बल्कि यह मेरे माली का बेटा है...." आकृति ने बच्चे की ओर देख मुस्कुराते हुए कहा था....और अब यह मेरे साथ ही रहता है मेरे बेटे की मानिंद"'
            अभिव्यक्ति बड़ी हैरानी से आकृति की बातें सुन रही थी साथ ही उसके चेहरे के भावों को भी पढ़ना चाह रही थी. विवाह के बाद अभव्यक्ति, आकृति के व्यक्तित्व में बदलाव को देख कर ही   अपने बचपन की सखी से दूरी बनाने लगी थी.उसे याद आ रहा था ,कैसे बचपन में दोनों अमीरी-गरीबी की बातों का खेल खेल जाते. कैसे दोनों अठखेलियाँ करती रहती थी.  स्कूल से आते-जाते बड़ी अट्टालिकाओं को देख मस्ती में ही 'ये तेरा महल ये मेरा महल',या फिर सामने से हवा से बातें करती हुई रोड पर बड़ी गाड़ियों का बँटवारा भी हो जाता, यहीं से शुरू हो जाती ख़्वाबों की ताबीर और मंज़िल के पहुंचने तक इमारत पूरी भी हो जाती.ऐसा ही था उनका बचपन एवं किशोरावस्था.परन्तु विवाह होते ही ख़्वाबों की ताबीर का ये हश्र होगा !अभिव्यक्ति को ऐसा आभास कभी भी नहीं था.अमीरों में ब्याही, बड़े ओहदे पर आसीन पति ने जैसे आकृति की सोच ही बदल दी थी.गरीबी क्या ,मध्यम वर्गीय लोगों से भी वह बात करने में कतरातीं. ऐसा लगता था कि कहीं इन लोगों की उसे नज़र ना लग जाए.
                 जैसा की यह माना भी जाता है कि समय से बड़ा कोई सीख दे ही नहीं सकता. आकृति के पति स्वभाव ठीक उसके विपरीत था. उन्हें हर किसी से के साथ उठना बैठना बहुत भाता था , परन्तु यह बात हमेशा ही उसे खलती थी . बच्चे भी ठीक अपनी मां पर ही गए थे. पढ़ लिखकर बच्चे जब बाहरी देशों में स्थापित हो गए. अब  माँ-बाप के लिए इनके पास समय नहीं,अपनी मस्तियों में झूमते इनमें भावुकता जैसी बात भी समाप्त हो चुकी थी. एक समय ऐसा भी आया कि आकृति के पति गंभीर बीमारी के हालत में , उन्हें अस्पताल तक उठा कर ले जाने वाला कोई भी नहीं, खून की जरुरत है  तो सगे- सम्बन्धी भी नदारद .ऐसे में इनका  कमजोर और गरीब सा दिखने वाला माली अपने मालिक को अस्पताल ले जाने से लेकर खून दान करना और  बेटे की तरह वहीं उनके पास बैठ ,सेवा करता रहा  इन विषम परिस्थितियों में माली का बेटा मालकिन को अपने प्रेम और तोतली भाषा में असिक्त  खिलाता-पिलाता और तब तक माथा सहलाता जबतक की मालकिन गहरी नींडी सो न जाती.
         अपने जिन बच्चों और सगे-सम्बन्धियों संग आजतक खुशियां मनाती रही, उन्होंने ही ऐसे मौके पर अचानक से आकृति को अकेला कर छोड़ा था.तभी उसे अपने बदगुमानी अहसास हो गया था .अब  समाज की विभक्तियाँ उसे खलती नहीं थी और सभी उसे अपने परिवार के सदस्य जैसे लगने लगे थे.अब वह विभिन्न प्रकार के पौधों वाली  बगिया की बागबान थी जिसे सींच कर उसे सुन्दर और अपना बनाना था.
           आज जब उस बच्चे संग इतने वर्षों बाद आकृति अपने मायके आई थी तो अभिव्यक्ति के समक्ष इन घटनाओं का जिक्र, मन पर से बोझ हल्का करना और बदगुमानी का प्रायश्चित करने जैसा उसे प्रतीत हो रहा था.

Thursday, 5 January 2017

अरण्या

"कर्मण्ये वाधिकारे माँ फलेषु कदाचन", आज अरण्या इस कहे का सही मायने में अर्थ समझ चुकी थी. शायद इस कारण से ही तो आज वह दुनयावी चाहतों और उम्मीदों से दूर,संतुष्ट एवं सुखमय जी पा रही थी. सात सन्तानों में सबसे छोटी होने के कारण घर -बाहर सबों में छोटी बच्ची ही बनी रही. माँ-बाबूजी से सीधे तौर पर कभी बात करने का उसका मौका ही नहीं आया. अपने बड़े भाई बहनों की बातें सुनते और उन्हीं को अनुसरण करते बड़ी हो रही थी. परन्तु परिवार और समाज में होते उठा-पटक ने ना जाने कब का उसे परिक्व बना दिया था ,परन्तु उसकी सोच को भी कोई समझ पाता,किससे बताती वह,उसने अपने लिए मन ही मन एक कल्पना की दुनिया बना ली थी और उस दुनिया में हकीकी समस्याओं को कल्पना पटल पर रख खुद ही सवाल बन जाना ,आत्म मंथम करना और खुद ही में समाधान पा मन ही मन खुश हो जाना, यही उसके जीवन का तरीका बन गया था. उसकी यह विशेषता उसे विषम से विषम परिस्थितियों में भी सकारात्मक जीना सुझा जाती थी.उसकी इस विशेषता को लोग शायद उसकी कमजोरी अथवा डर मान बैठे थे जबकि खुद में वह इसे आत्मबल मानती थी और इस कारण अरण्या कभी टूटी नही थी.इसी कल्पनाशील दुनिया में एक उसने परिवार का सपना देखा था जिसे वह हकीकी जामा पहनाना चाहती थी. उसने सोचा था कि समर्पण की भावना ही सुखी पारिवारिक जीवन का सूत्र है, पर यह क्या यहाँ तो  सूत्र ही उलटे पर गए.सारी सृजनशीलता और कल्पनाशीलता मौन पड़ गई , अरण्या ने भी जीवन से समझौता कर लिया था कि बाकि का जीवन भी वह आशाओं और उम्मीद की ख्वाहिश में ही बिता लेगी.
बच्चों की सर्दियों की छुट्टी चल रही थी.आज काफी दिनों की ठंडक के बाद धूप की तपिश में बच्चे अपने स्कूली घरकाम कर रहे थे , तभी अरण्या की नज़र इंद्रधनुष के उस अधूरे से चित्र पर पड़ी, जिसे उसका बेटा बड़ी लीनता से उसे पूरा करने में लगा था. अरण्या के मन में भी एक बिजली सी कौंधी , उसने भी एक कैनवास ले कूची से ना जाने कितने ही रंग बिखेरे और बिखेरती चली गई.आज शायद उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान हो आया था . इंद्रधनुष में तो सात ही रंग होते है पर अरण्या इन रंगों के सहारे ना जाने कितने सारे और रंग बिखेरती गई और जहां कैनवास को भी अपनी सीमा बढ़ानी पड़ी.

घर -संसार

"देखो ना पांच महीने से अपनी बेटी-दामाद  को संभाल ही तो रहे थे.सोचा था जैसे भी हो नाती को पांच महीने का पाल पास कर ही उसके दादा के घर भेजेंगे.कितना अरमान था ख़ुशी-ख़ुशी बेटी को ससुराल भेजने का, सब बेकार गया." शाम में अपने ड्राइवरी की नौकरी से गजानन घर लौटे ही थे कि पत्नी अपने रुआई स्वर में फूट पड़ी. दुःख तो गजानन को हुआ भी पर पत्नी को समझाते हुए खुद भी टूट पड़े थे. समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. विवाह के डेढ़ साल के बाद के अंतराल में गजानन ने ना जाने कितने तोहफे अपनी बेटी के ससुराल भेजे थे. अलावे इसके कि जब वह गर्भवती हुई तो गजानन ने बेटी को उसके मायके बुलवा लिया था. बिचारे सामजिक रिवाज़ और दो बेटे पर एक बेटी का पिता होना भुगत रहे थे. अपनी ड्राइवरी से इतनी कमाई करना चाहते थे जिससे परिवार का भरण-पोषण हो जाए. इसके लिए बेशक दिन और रात ऑटो रिक्शा क्यों ना चलाना पड़े.
             आज गजानन अपनी वेदना अपने पुराने मालिक -मालकिन को सुना रहा था,जिससे उसे गहरी आत्मीयता थी. मालकिन ने तब गजानन को समझाया था _ "देखो गजानन, बेटी के लिए तुम्हारी ये तड़प वाकई सच्ची है, पर हमेशा याद रखना , अपने बच्चों के आगे कमजोर मत पड़ो. कुछ करना है उनके लिये तो  एक मजबूत नींव की मानिंद खड़े रहो ना कि एक बैसाखी की तरह जो हमेशा तुम्हारा सहारा ले खड़ा हो. तुम्हारी जो जिम्मेदारी थी वह पूरी हुई, अब यह उनकी जिंदगी का कैनवास है ,अब उन पर छोड़ो कि वो रंग कैसे भरते है ."

Tuesday, 3 January 2017

हकीकत जान कर भी क्यों अंजा हैं सब

हकीकत जान कर भी क्यों अंजान है सब"

बात यूँ थी, मन था
कुछसोच रहा
हत्या का था मुकदमा
स्त्री थी दहेज पीड़िता
जी कर भी बेमौत
मारा गया उसका
दो मास का बच्चा
हालात की बेबसी का
उसके सबको थी पता
समझा सकते थे लोग
धमका सकते थे लोग
सगे संबंधियों के उसको
पर करना पड़ा था उसे
हालात से समझौता
भला पैसों की दुनिया में
मुफलिसी को कौन पूछता
बेटी जो हुई , हालात माँ-बाप
की थी वो जानती
जान कर भी
सब कुछ ,मुसीबतों
में पाँव अपने उसने
डाल दिये
अब पूछता है कौन
उसकी जान को
अखबारों के पन्ने सा बना
दिया नियम कानून को
जहां कानून भी अँधा है
पैसे कमाने का
छाया है एक नशा
क्या समाज
कैसे जज़्बात ,
"हकीकत जान कर भी
क्यों अंजान है सब".
©@Ajha.04.01.17

Monday, 2 January 2017

ससुराल गेंदा फूल

"अरे घूँघट क्यों कर रही हो हमसे. ये हमारा सौभाग्य कि तुम यहां आईं. एक बात और , यदि तुम घुघट में ही बैठोगी तो हमें पहचानोगी कैसे?" पतिदेव की नानी कीे कही ये सारी बातें श्यामली के कानों में आज भी गूंज रहे थे. आज विवाह के इतने साल होने को आये मगर हर वो बातें उसे याद थीं जिसने उसके जीवन में मधु रस घोलने का काम किया था. श्यामली शहर में पली बहुत ही सिमित माहौल में पली बढ़ी थी. ग्रामीण परिवेश में विवाह होने से थोड़ा सहम सी गई थी.ऐसा नहीं कि वह परिवार बनाना नहीं जानती थी, परंतु एक समय में इतने बंधू बांधवों की कसौटी पर खड़ा उतरना ...
    विवाह के कुछ ही दिन तो हुए थे कि मामी सास श्यामली के लिए देवी रूपा हो आईं थीं ,समय-समय पर अपने  सकारात्मक अनुभवों से एक कदम और आगे बढ़ने की उसे प्रेरणा दे जातीं.जिस ससुराल में आधे मीटर का घूँघट और बहू की आवाज दूसरों के कानों तक ना पहुंचे उसे के अच्छे संस्कारों में गिना जाय, वहां भला श्यामली कैसे रच-बस पाती.यही सोच के दिन काटे जा रहे थे और एक दिन ऐसा भी आया कि श्यामली ने खुद को लंबे से घूंघट में ससुराल में पाया.तभी अनेकों विधि-विधान और परिवार ,सगे-संबंधियों के बीच स्यामली के सास-ससुर ने ऐलान किया था _ "आज से श्यामली मेरी बहू नहीं बेटी है, इस घर में कोई पर्दा प्रथा नहीं चलेगा .भगवान् ने बेटी नहीं दी परन्तु बहु के रूप में मुझे जो बेटी मिली वह मैं घुघट के कारण कदापि खोना नहीं चाहता."
  @Ajha.03.01.16