मुहब्बत का ये कैसा असर
उसने मुस्कुरा के देखा तो
खुद पे ऐतबार ना हुआ ,
और जो मुँह मोड़ लिया तो
उस पे ऐतबार ना रहा .
फ़िर भी हिम्मते - मरदाँ तो देखिये _
नज़रें जहाँ तक गयी
तलाश बस उन्हीं की रही .
Wednesday, 23 December 2015
ये कैसा असर
मुसाफिर
मुसाफिर हैं इस लम्बे सफ़र का ,
चलते जाना है अपना काम ,
राह - राह पर डगर अलग है
पकड़ अलग है , मन भावन है ,
पथ भ्रामक है , कभी कारवां ,
कभी तन्हाई
मीत मिले हैं , प्रीत मिली है
और मिलन के साथ जुदाई ,
इन सब की अनुभूति से
दिल ना लगाना . क्योंकि ,
मुसाफ़िर तुम्हें तो है चलते जाना .
बुनियाद समय से
ये ना सोचिये गुजरा साल
भूला जाएगा ,
जो कुछ भी गुजरी
उसी बुनियाद पर नया साल
उम्मीदों और खुशियों से
दामन भर लायेगा .
सोच
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
चल उठ जा प्राणी
नम पड़ा क्यों तेरी आँखें
कर ले तू दुनियाँ से प्रीत .
सुप्रभात .
सलाम जाते हुए साल को
ऐ गुजरता हुआ ये साल, तू ये पैगाम लिख दे
कि " जाने वाला कुछ कमतर ना था ,
इसके आगे की कहानी तू अपने नाम लिख ले . "
किसी सोच की बुनियाद मांझी के दम पर होती है चाहे वो अच्छी हो या बुरी या फ़िर क्रांति , शांति या बगावत .
अतीत
जब इंसान की सेहत नासाज हो और रात का समय , चारों तरफ़ से खराटे की आवाज़ हो तो मन और दिमाग बहुत बेचैन होने लगता है . ऐसे में हम अपने पिछले जीवन के कई काल खंडों को जी जाते हैं _ अच्छी भी और बुरी भी . गत तीन - चार दिनों से viral के चपेट में हूँ . बेचैनी के आलम में मैं अपने विश्विद्यालय के ज़माने में जा पहुँची . (मेरा मानना है कि JNU , New Delhi में बिताये पाँच साल मेरे लिये बेशकीमती है. मुझे वहाँ के जर्रे - जर्रे से आज भी उतनी ही मुहब्बत है .)मेरे उन्हीं दिनों को समर्पित ये कविता _
आज ना जाने अतीत में मन क्यों विचर रहा ,
उन दोस्तों को तलाशती मेरी आँखें और मन
मुस्कान भर रहा .
था वो दौर जब हम चाय की चुस्कियों पर मिला करते ,
25पैसे की एक प्याली पर घंटों विश्व पटल पर चर्चे किया करते, और
ऐसे ही मद - मस्त जिया करते .
कभी अपने वाद- विवादों से PM की कुर्सी को
हिलाया करते , और
बन पड़ी तो नये CM को अपनी बात में लाया करते .
वो भी क्या दौर था _ मंडल - कमण्डल का चहूँ ओर शोर था .
सद्दाम बने थे हीरो , क्लिंटन के लिये भी चर्चा कुछ और था .
ना था वो उतना मोबाइल और इंटरनेट का ज़माना
पर खबरें तेजी से फ़ैल के हो जाती फ़साना .
पर जनाब , जेहनी लोगों का दौर था ,
इल्म की बातों से ही खुद को हम अमीर समझा करते ,
जेब में कहाँ थे इतने पैसे कि खुद को गरीब समझाकरते .
आज ना वो दोस्ती है ना दौर है ,
बस पैसे ही पैसे की होड़ है .
रिश्ते भी पैसे ही ढूंढा करतीं ,
इंसानों की ना रही कोई पूछ है .
जिंदगी से दो टूक बातें .
जिंदगी जो हँस के गुजारनी चाही , गुजर ना सकी,
वो तो खुद से किया एक वादा था जो हँसकर गुजार दी .
जो तेरे दाग थे दामन में , और जो दाग लगे मेरे दामन में ,
उसे कभी धो ना सके , और इसलिये कभी खुल कर रो ना सके .
दुनियाँ के रंजिशों - रवायतों का बोझ कुछ ऐसा था कि ,
कभी ढो ना सके और इसके कभी हो ना सके .
दुनियाँ में अकेले ही आये हैं अकेले ही जाना होगा , इस रीत को निभाना होगा .
तुम कभी नाउम्मीद ना हो , नासाज ना हो
तेरे से वादा था संग रहने का , संग तेरे जिये जा रहे हैं .
नाकामयाबियों का शोक मनाना मुझे मंजूर नहीँ, इसलिये हर दिन को जश्न की तरह जिये जा रहे हैं .
है तबाहियों का आलम चारों ओर , हिम्मत तो देखिये मेरी _
फ़िर भी खुद को संवारते जा रहे हैं .