Friday, 15 January 2016

श्रधांजलि

श्रधांजलि
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दोष आरोपित हो किसपे कि ,
इक जांबाज़ पर प्यार आया .

बहुत अरमां से दिल दे बैठी कि ,
वो देखो , हिन्द का फौजी
जांनिसार आया है .

ना था अंदेशा लहू के बहने का ,
जो कलाबाजियों , जाँबाजियों पर खुद को लुटा बैठी .

काग़ज़ की कश्ती और गुड़ियों का खेल था  मैंने खेला , अब जिंदगी का खेल मुझे झेलना होगा .

पहले तो दूर हो के भी पास होने का ख़याल  होता था ,
आज हर कुछ खोया - खोया सा गुमा होता  है .

हवा  के संग उनकी दुआएं भी साथ आती थी
संग प्यार का पैगाम लाती थी .

देश की बदहवाओं से , पड़ोसियों की बदनिगाहों से
फौजी की दिलदारी , वफादारी देखी ना गई .

बदसोच का वो ऐसा शिकार हुआ ,
भगवान की भी हार हो गई .

नेताओं के सुख के आगे,किस पर ये देश करे विश्वास अरे कुछ तो करो अब कुर्बानियों का हिसाब .

अब कौन सुनेगा मेरी इस फरियाद को
" लहू बहाने वालों अब कहीँ तो विराम दो " .
@Ajha .
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देश के लिये न्योछावर होने वाले सभी जवानों को शत - शत नमन और परिवार के प्रति सहानुभूति .

Soch aur sanskriti

दिल हुम - हूम करे , घबराये . . . .
तेरी ऊँची अटारी , मैंने पंख लियो कटवाय . . .

जी हाँ सही समझा आपने . कला , संस्कृति और अपने प्राचीनतम समय में विचरण करने का एक अपना ही मज़ा भी है और नशा भी .   ठीक उसी तरह का नशा ,  जैसे कि किसी को सिगरेट,  दारू, पढाई इत्यादि का हो . कितना भी मुझे 'जोधा बाई '  होने के एहसास ने कुछ पल के लिये रानी बना दिया और उन शाही पलों में मैं खुद को खोने लगी पर जब वास्तविक जीवन की जीने की बात है तो लगता है प्रजातंत्र में जीने का एक अलग ही आनंद है . हो सकता है मेरी दलील एक पक्षीय हो . हो सकता है प्रजातंत्र में ही पहला साँस लिया है और अब तक लेती आ रही हूँ . अब आप अगर इसमें खामी निकालेंगे तो मैं यही कहूंगी कि इसका जड़ कारण भी 'आजादी का सही मायने में दुरुपयोग ' होना ही है .@ Ajha .

मंजिल

प्रकृति ने जो हमें कलाकारी दी है उसे ही हमने अपने कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता की देन मान बैठे हैं .@ Ajha .

इंतज़ार

इंतजार ऐसे में कैसे कोई क्या कहे और क्या सुने ,
कशमकश में हूँ , कि था जिसका इंतज़ार  ,
देखो
वो दूssssर से आ रहा . . . . . .

पंछी तेरा बस एक ही ठीकाना .

मीना दीदी आप के चित्र - चुनाव कितना  कुछ कह जाते हैं .

सज़ा

बरषों की खता किसने की
जन्मों की सज़ा हमने है पाई .
बैठे तो हैं वो मौन से ही मुद्दतों से
पर वार जो ख़ंज़र का हुआ नज़रों से मुझ पर
किसको बतायें अपनी , दुहाई है दुहाई .@ Ajha .

मैं और मेरा आईना

आईना
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वो जो था मेरा आईना  , बैठी हूँ उसके पास मैं .
वही आईना जो कभी मेरी मासूमियत पे हँसता होगा .

यादें वो माँ की मार का , पिता के प्यार का
वो चोटियों को प्यार से गूंथना
नये कपड़े में खुद को निहारना ,

सब कुछ तो दिखता था ,
कितना प्यारा था वो आईना .

ये तो आईना ही था जो ग़म और खुशियों को
इतनी करीबी से निहारता , और फ़िर
मुझ से ही मुझे पुचकारता .

जवानी में आईने के मायने बदल गये
कभी इससे प्यार हुआ तो कभी
नफ़रत बेहिसाब हुआ .

जितनी भी बातें थीं , वो सब
आईने को ही तो थीं बतानी , कभी इसे
वफादार कहा , तो कभी ये धोखेबाज़ हुआ .

अब जब बैठी हूँ उसी आईने के सामने ,
कितना कुछ बदल गया ,इतने बसंत जो हम साथ थे , ना पूछो क्या हाल हुआ .
अब तूँ ही बता आईना _

" क्यों ऐसी विरक्ति मेरा तेरे साथ हुआ " .@ Ajha .

मेरे प्रभु

करना है कई प्रश्न उस निराकार ईश्वर से ,
उस कर्ता - भर्ता- हर्ता से ,
लड़ूं मैं किससे अपने वजूद को .

जब सब सुख में तुम्हीं समाये हो , तो
दु:ख का कारण क्यों हम इंसान बने .

रिश्तों में तो हमने खुद को ढाला  तो
फ़िर खून का क्यों हम इलज़ाम लें .

धरा पड़ी है जल्लादों से, सैयादों से ,
बैठे हो  तुम मूक - बधिर से , फ़िर ,
क्यों हम तुमको भगवान कहें .

डोर जो थामे रखा है कठपुतलियों का
क्यों हरदम नचाते हो , क्या
तुम्हें रास आता नहीँ दो पल सुकूनो- आराम का .

@ Ajha .