Monday, 29 February 2016

कल रात वो गा रहा था . . .

किसी के time line पर एक line पढ़ा था 'कल रात वो गा रहा था ' बस उसी पर ही ये poetry लिखी थी . अपनी पिछ्ली कविताओं में खुद को झांकने का मन किया सोचा आपसे भी साझा कर हीलूँ

गुजिश्ता शब की  बात है
भर शब कोई गा रहा था
मानो किसी को वो बुला रहा .
समा भी ऐसी , मानो ,
चाँदनी भी शरमाई - सी ,
काली घटा बादलों में मुस्काई -सी
आहटें , ऐसी कि किसी के आने से ,
सहम गई नार कोई दीवानी -सी .
गीत की तास्सिर  ऐसी , मानो
नार - दीवानी मंद-मंद - मस्त चाल से
अपने दीवाने के तार पर चली आ रही .
हवाओं की शीतलता ,
उसे घूंघट ओढा रही ,  मानो
सबकी नज़र से उसे बचा रही  .
इतनी वो प्यारी शब , मानो
मुझे भी अपनी गुजिश्ता याद करा रही .
जैसे - जैसे सुर - लहरियाँ
मेरे कानों तक आने लगी , मानो
कोई बिसरी - सी कोई , सामने मुस्कुराने लगी .
जितनी भी चाह रहा उसे भूल जाना  ,
क्योंकर वो मेरे क़रीब आ रही थी  .
वो जो गा रहा था , शायद
अपने दिल की गुनगुना रहा था .
शायद अपने भी तार कुछ मिल रहे थे
तभी तो उन तानों पर ,
मैं भी खींचा चला आ रहा था , मानो
अपने अजीजो - जान को मना रहा था ,
ना जाने किस बात से मैं
वाबस्ता हुआ जा रहा था .
कैसी वो रात आज भी मानो
वैसे ही यादों में बसी है
पसे चश्म यूँ ही नाचती है .
@ Ajha . 29. 02. 16

Friday, 22 January 2016

नामुराद जिंदगी

नामुराद इस जिंदगी ने दिया कम ,
जो दिया वो
दो आरजू , दो इंतज़ार में गुज़र गये
फ़िर भी इंसान कहता रहा _
ये तो हमारी किस्मत थी , जो मिला
सो बहुत मिला .@ Ajha .

Thursday, 21 January 2016

कहते भी हैं और शिकायत भी . . . .

कहते भी हैं और ,
शिकायत भी है कि
रोज़ तुम मिला करो .
पर सच तो ये है मेरे दोस्त _
मन मिलने की बात है सो मिल गये ,
भौतिकता तो दिखाने की बात है ,
क्षण भंगुर है , भंगुर हो के रहेगी
शाश्वत मन का मिलना है
ना दिखे किसी को , अमर तो रहेगी .
@ Ajha . 22. 01.16

धर्म के नाम पे लड़ने वालों . . .

धर्म के नाम पे लड़ने वालों ,
बुरा ना मानों ऐ  दुनियाँवालों 
कैसा ये 'धर्म की राह 'और कैसी ये 'सीख '. 
बचपन में जो सिखाया  _ 
" तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा , "
उसी कदमों पे हम चले थे
ना मालूम था कि मुर्शीद के सीख की
नींव इतनी कमज़ोर थी कि
इक हवा के झोंके ने
अल्फाज के मायने ही बदल डाले .
अब तो वर्षों की सीखी हुई बातों से
खुद को तो जुदा कर गये , पर
दिल में अब भी  वो सीख बाँकी है .
सुना था , इतिहास खुद को दुहराती है,
आज हम उसी दोराहे पे खड़े हैं , जहाँ
मेरे लिये मुर्शीद  की पदवी है और
शागिर्द मेरे सामने है .
फ़िर उसे सीख बतानी है और
उसके सामने फ़िर वही ज़माना है . .
@ Ajha . 22. 01. 1

Mursheed - guide
शागिर्द - स्टूडेंट , deciple

दोस्ती : दिल की बातें

चाहे रास्ते कितने ही लम्बे हो जायें ,
चाहे आप कितनी ही आसमानों को पार कर जाओ ,छाप जो लग़ा दी हमने आप पे दोस्ती की
आकार में नुक्ता ही सही , नज़र तो हम आयेंगे ही चलो ये तो अच्छा ही हुआ कि याद हमें करते - करते सफ़र कट ही जायेंगे .
शुभ यात्रा , दोस्ती को सलाम
@ Ajha .

Friday, 15 January 2016

बाजी राव मस्तानी (फिल्म )

आज 'बाजी राव मस्तानी' फिल्म  देखने गई थी . बहुत दिनों के बाद मंत्र - मुग्ध हुई पड़ी हूँ . अब तक ये तय नही कर पा रही कौन सा पक्ष कमज़ोर या सशक्त मानू. क्या कहानी , क्या दृश्यावली , क्या गाने _ बेमिसाल . ऐसा लग रहा था राजा रवि वर्मा जी की painting सजीव हो गई है , अद्भुत . मैं कहूंगी 'अनारकली 'के बाद इस तरह की मुझे ये पहली फिल्म लगी जिसमें हर बात पर 100 अंक देने का मन बना लिया है . गाने एक से बढ़कर एक है जो classical हिन्दी और laavni है . पर जो मेरे दिल को छू गया उस गीत को यहाँ मैं दे रही हूँ सुनयेगा  जरूर . @ Ajha .

तुझे याद कर लिया है
तुझे याद कर लिया है
आयत की तरह

कायम तू हो गयी है
कायम तू हो गयी है
रिवायत की तरह

तुझे याद कर लिया है
मरने तलक रहेगी
मरने तलक रहेगी
तू आदत की तरह

तुझे याद कर लिया है
ओ तुझे याद कर लिया है
आयत की तरह

ये तेरी और मेरी
मोहब्बत हयात है
हर लम्हा इसमें जीना
मुक़द्दर की बात है

कहती है इश्क दुनिया जिसे
कहती है इश्क दुनिया जिसे
मेरी जान इ मन
इस एक लफ्ज़ में ही छुपी कायनात है

मेरे दिल की राहतों का तू
जरिया बन गयी है
तेरी इश्क की मेरे दिल में
कई ईद मन गयी है

तेरा ज़िक्र हो रहा है
तेरा ज़िक्र हो रहा है
इबादत की तरह

तुझे याद कर लिया है
ओ तुझे याद कर लिया है
आयत की तरह

नया साल

सुस्वागतम नव वर्ष- 2016
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फ़िर से नया साल आ रहा
क्या भूला , क्या याद रहा
क्या खोया , क्या साथ रहा .
कई कालखंडों को जीने में
कई बातें हुईं , वाकयातें हुईं .
कभी कोई संगी - साथी हुआ
तो किसी ने साथ छोड़ दिया .
प्यार हुआ , इकरार हुआ
जीने को संसार मिला .
जिम्मेदारियों का खुद को एहसास हुआ
वफादारी का हर बार इम्तहान हुआ .
किसी की खुशी के सबब हुए ,
तो कोई , दुखों की पोटली दे गया .
ज़माने से ही शिकायतें रहीं , और
ज़माने से ही प्यार हुआ .
कभी भीड़ के साथ हो चले
कभी तन्हाई सच्ची लगने लगी .
उम्र गुजरती रही , हमसफ़रे - जिंदगी
की तादाद बढ़ती गई .
आश्चर्य - चकित रहे ,
संग आनंदित होते रहे
अपनों में परायों को देखा ,
पराये अपने लगने लगे .
जिंदगी के खेल हम देखते रहे ,
जिंदगी के सफ़र में जो जितना साथ दे
अपनी ख़ुशकिस्मती मान अपनाते रहे .
अब खुद को समझाया है _
परछाई अपनी सच्ची है ,
बाँकी सब तो माया है .
यही सोचते - आंकते एक और साल गुज़र गया , नववर्ष फ़िर से सामने है आ खड़ा  , आइये
अनेक शुभकामनाओं के संग करें
सुस्वागतम , सुस्वागतम , सुस्वागतम .@Ajha .