चेहरे पे ख़ुशी जुबां पे हँसी
तन्हाई में भी इक नूर सी दिखाई दी है
बदले - बदले से नज़ारे हैं .
शायद तेरी याद आई है .
@Ajha . 26. 02. 16
Monday, 29 February 2016
याद
अफ्सुर्दा
तेरी बातों से अफसुर्दा
तेरी वादों से अफसुर्दा
तेरी लम्स से अफसुर्दा
तेरी तन्हाई अफसुर्दा , अफसुर्दा
तो बता ऐ जिंदगी _
हम जिये तो कैसे जिये .
@ Ajha . 27. 02. 16
अफसुर्दा _ sadness
लम्स - touch
इलज़ाम
@ Archana Mishra
बातें जो हैं अफ्सुर्दा , अफ्सुर्दा
कर दो उन बातों को बेपर्दा
वरना इलज़ाम ये हम पे होगा
कि कर दिया कायनात को अफ्सुर्दा .
@ Ajha . 26. 02. 16
अफ्सुर्दा : sadness
हुस्न
Manjulaji _
जल जाने दो हुस्न से कायनात को
क्यों रहे हुस्न पोशिदा
इसी बहाने से सही
पैगामें मुहब्बत दुनियाँ में छा जाये .
@ Ajha . 26. 02. 16
आँसू
उन्वान - 109
शीर्षक - आँसू /अश्क /अश्रु
रुखसती जो हुई उसकी बहुत रोया
आज महबूब के आने की ख़ुशी में है खोया
आँसुओं के संग जज्बातों को क्या खूब पिरोया
या मौला ! कितनी शहादतें और इन अश्कों की तूँ लेगा . @ Ajha . 28. 02. 16
Aparna Jha
Rukhsati jo hui uski bahut royaa
Aaj mahboob ke aane ki khushi me hai khoya
Aansuon ke sang jajbaaton ko kya khub piroyaa
Ya maula ! kitni shahaadaten aur in ashkon ki tu legaa .
@ Ajha . Aparna jha .
कवि मित्र
हम housewives के लिये सप्ताहंत के दिन weekdays के रुप में होते हैं जहाँ office goer members of the family holiday enjoy करते हैं , उस holiday को सुंदर बनाना हम house wives का काम होता है . पर इन gaps में मित्रों की शिकायतें बढ़ जातीं हैं. जैसा की एक मित्र ने फरमाया _
" जल रहा है हिन्द वो बेखबर , उसे तो बस अपनी शोहरत चाहिए_ "
इसमें मेरा जवाब तो लाजिमी है _
" यहाँ आशियां बुनते - बुनते गुज़र रही हैं शामों शहर
और एक हुजूर हैं जिन्हें हर बात में शोहरत नज़र आती है "
@ Ajha 28. 02. 16
कल रात वो गा रहा था . . .
किसी के time line पर एक line पढ़ा था 'कल रात वो गा रहा था ' बस उसी पर ही ये poetry लिखी थी . अपनी पिछ्ली कविताओं में खुद को झांकने का मन किया सोचा आपसे भी साझा कर हीलूँ
गुजिश्ता शब की बात है
भर शब कोई गा रहा था
मानो किसी को वो बुला रहा .
समा भी ऐसी , मानो ,
चाँदनी भी शरमाई - सी ,
काली घटा बादलों में मुस्काई -सी
आहटें , ऐसी कि किसी के आने से ,
सहम गई नार कोई दीवानी -सी .
गीत की तास्सिर ऐसी , मानो
नार - दीवानी मंद-मंद - मस्त चाल से
अपने दीवाने के तार पर चली आ रही .
हवाओं की शीतलता ,
उसे घूंघट ओढा रही , मानो
सबकी नज़र से उसे बचा रही .
इतनी वो प्यारी शब , मानो
मुझे भी अपनी गुजिश्ता याद करा रही .
जैसे - जैसे सुर - लहरियाँ
मेरे कानों तक आने लगी , मानो
कोई बिसरी - सी कोई , सामने मुस्कुराने लगी .
जितनी भी चाह रहा उसे भूल जाना ,
क्योंकर वो मेरे क़रीब आ रही थी .
वो जो गा रहा था , शायद
अपने दिल की गुनगुना रहा था .
शायद अपने भी तार कुछ मिल रहे थे
तभी तो उन तानों पर ,
मैं भी खींचा चला आ रहा था , मानो
अपने अजीजो - जान को मना रहा था ,
ना जाने किस बात से मैं
वाबस्ता हुआ जा रहा था .
कैसी वो रात आज भी मानो
वैसे ही यादों में बसी है
पसे चश्म यूँ ही नाचती है .
@ Ajha . 29. 02. 16