Monday, 22 August 2016

कभी यूँ भी होता


​क्या अधिकार दूँ कि लब खामोश हो गये 

इन जज्बात की बातों में अल्फाज कहीँ गुम हो गये 
ऐ वक्त ज़रा तू भी तो ठहर कि 

इक पल को ज़रा मैं भी तो जी  लूँ . 
कभी यूँ भी होता गुजरती मैं उन गलियों से 

जो पस - मंजर मैं यार होता 
इक पल को ही सही 

मुझे उनका दीदार होता 
ना फ़िर होतीं कोई जिंदगी में चाहते 

इबादत ही  होती मेरी राहते  
ना फ़िर कोई चाह नेमतों की 

ना फ़िर कोई राह जेहमतों की 
ना कोई लम्स चाहिये , ना कोई तिशनगी कोई 

ना आरायिश ही कोई 
फ़कत इक पल का दीदार , इक इजहार 

और इक ख़याल कि इसी हाल में 

सुपुर्दे खाक हो जाता  .

सुपुर्दे खाक

सुपर्दे खाक

​क्या अधिकार दूँ कि लब खामोश हो गये 

इन जज्बात की बातों में अल्फाज कहीँ गुम हो गये 
ऐ वक्त ज़रा तू भी तो ठहर कि 

इक पल को ज़रा मैं भी तो जी  लूँ . 
कभी यूँ भी होता गुजरती मैं उन गलियों से 

जो पस - मंजर मैं यार होता 
इक पल को ही सही 

मुझे उनका दीदार होता 
ना फ़िर होतीं कोई जिंदगी में चाहते 

इबादत ही  होती मेरी राहते  
ना फ़िर कोई चाह नेमतों की 

ना फ़िर कोई राह जेहमतों की 
ना कोई लम्स चाहिये , ना कोई तिशनगी कोई 

ना आरायिश ही कोई 
फ़कत इक पल का दीदार , इक इजहार 

और इक ख़याल कि इसी हाल में 

सुपुर्दे खाक हो जाता  .

@ Ajha . 14. 03. 16

सुपुर्द ख़ाक

 ​ये बादे - बहार , 

ये रुस्वाइयों का आलम 

काश के नज़रें मिल जातीं  

मुनाज़िर  ज़रा देख लेते .

हाँ बहारें आईं थीं , संग खिजां भी लाई थीं 

ऐ दोस्त बहारों को इलज़ाम ना देना  

मौसम ही तो था , अपनी खुशियाँ दे गया 

ये नज़रों की अदला - बदली 

वो ख़ुशी ओ ग़म की आँख मिचौली 

रंगत भी है कुछ जुदा - जुदा 

चहुं ओर पसरा ये सन्नाटा  

लगता है फ़िर किसी  की मौत हो गई 

वो तो गहरी नींद सो गया पर 

फ़िर से जहान खुशियों में तब्दील हो गया

एक फ़कीर तन्हा जो आया था  

आज सुपुर्दे खाक हो गया . 

@ Ajha .06. 03. 16

हिचकियाँ

​हिचकियां आईं थीं मुझको 

हाँ , शायद वो फ़िर  याद आया . 

कहा करता था मुझसे , अब क्या लिखूं मैं कविता 

कल्पना में मेरी जो थीं बसती, वो मुझे था मिल गया 

मेरा औचित्य वही, जीवन आधार वही

वो ही है धूरी जिस पर कर रहा था वो परिक्रमा 

कुछ  समझ आता नहीं

ये ज़िंदगी भली या वो जो थी मृग तृष्णा 

आज  ज़िंदगी के मायने बदल गये 

कहता था कलतक वो जो कुछ भी मुझ से 

वही आज हो गई जीवन के उसके  हिस्सा 

कलतक जब ना था वो पास उसके

 थी पास उसकी कविता 

आज जब है दूर वो उसके

जीवन उसकी बन गई है कविता 

लोगों से अब पूछता वो फिरेँ _ 

क्यों जुदाई का सबब है ऐसा 

सारी दुनियाँ हो जाती है एक तरफ़ 

इक वैरागी ही क्यों रह जाता तन्हा 

प्रेम

प्रेम

​किस प्रेम की है तुझको आस , 
तुम्हीं बताओ मुझ को आज . 
प्रेम किसे तुम कहते हो ,

वो जिस वासना में डूबा संसार ? 
जो लिखे हुए  दीवारों - दरख्तों पर आज ? 
या प्रेम तुम्हें वो लगती है , जो 

भरी पड़ी है वरकों में , अल्फाजों में अफरात? 
दुनियाँ का तुम भरम ना पालो , 
माया - जाल के भँवर में फँस ना जाओ . 

सच्चा प्रेमी ऐसा है ,
संग चले दुनियाँ के ,
पर अन्दर उसके खुदा है . 

पानी जैसा निर्मल है वो , 
आकाश के जैसी सोच
दुनियाँ का वो सबसे प्यारा , 

खुद के लिये तन्हाई उसकी संगी है . 
पर याद करो जो उसको
चेहरे पे मुस्कान- सी छाई  है . 

यही हकीकत प्रेम की
इसे ही प्रेम माना है.
ऐसे ही संग में जीवन बिताना है@ Ajha . 27. 01. 16

Wednesday, 17 August 2016

सोच, आसमान की उड़ान में

हर बात में गहराई को आंकना
अच्छा लगता था
हिम्मत ना थी
उंचाईयों को सोचने की
खुशियों की उम्र थी
लंबी इस कदर ,यह सोच कर
हमसे भी नीचे की दुनिया है
जीना तो है बस सहर भर
नसीब में रोटी तो है शाम ओ सहर
नींद को भी कहाँ चाहिए थी शाही बिस्तर
कई चांदनी रातों को निहारे
कितनी ही  बातें  की थी हमने
और की थीं मिन्नते चाँद से
काश! कि तुम जमीं पे होते
या उड़न तश्तरी पे होकर
तुम तक हम जा पहुँचते
कितने थे प्यारे ये सपने,
यूँ ही रात गुज़र जाती
ख्वाब में ही सब बात निपट जाती
आज ये क्या हुआ!
उड़न तश्तरी था सामने तैयार खड़ा 
आकाश में उड़ने ,
बादलोँ से बातें करने का
था फरमान हुआ
मान ली हुकूमत को
कमर  भी कस लिया अपना
ख़्वाबों में जो था सपना
सच हो गया आज वो सपना
विस्मित थी
पर यह क्या !क्यों मुझे
हरी -भरी धरा अपनी प्यारी लगने लगी
श्वेत , धवल, नीलाभ यह अब  क्यों
बदरंग से लगने लगे
मिथ्या ही था सब अब तक
मृगतृष्णा बन जो सताती रही
ख्वाहिश चाँद से मिलने की तब्दील हो गई
सच में दूर के ढोल सुहाने होते हैं
ऐ ज़मी तू ही जन्नत है, तू ही हकीकत
ख्वाब भी तूँ,
इन्तख़ाब भी तूँ ही
तूँ ही हूर और और देवी  भी तूँ
'सत्यम, शिवम्, सुंदरम 'की सार्थकता.
समस्त ब्रह्माण्ड की तुझसे ही है व्यापकता तभी है तेरी इतनी महत्ता.
और नमन है तुझको हम सबका.

डोर (रक्षा बंधन के बहाने)

रक्षा बंधन की डोर
रेशम से बनी बेजोर
दिखने में कितनी ही कमजोर
कई रिश्तों से बंधी
है बस यही जिंदगी
इक बार जो देखा इसे
कई गाँठ थे लगे
दाग भी थे और कई
फरेब और ठगी की थी किस्सागोई
बेजुबान थी लाचार भी
पर ये क्या!
कलाई पर ज्यों ही बंधी
एक ताकत की अनुभूति हुई
वो जो कई गांठें थी
अब सम्मान है
एकजुटता का निगहबान है
सपना है ,अपना है
हकीकत है
हाँ ,कुछ पल के लिए सोच में
घुन लग गया था
अहंकार में रम गया था
आँखें जो खुली
सब कुछ थी वहीँ के वहीँ
वो रिश्ते, वो सपने
और सभी तो थे मेरे अपने
बंधे एक नाजुक सी डोर से.