Monday, 6 February 2017

फाल्गुनी रंग

"चाची कात्यायनी को मैं ले जा रहा हूँ....."
"ठीक है....
पर ध्यान रखना. कहीं गिर ना जाए....
कोई धक्का ना देदे इसे...
ठीक से रोड पार करना..."
रमा चाची का इतना कहना रोज की ही तो बात थी और इधर सृजन का भी रोज का नियम... कात्यायनी को अपने संग स्कूल ले जाना, उसे खेलने ले जाना और हर बात में उसके साथ होना.
सृजन अपने परिवार का इकलौता संतान था.कात्यायनी अपने परिवार की इकलौती बेटी जो देख नहीं सकती थी.न कात्यायनी और उसके परिवार से सृजन का बचपन से ही एक अजीब सा था. दसवीं के बाद उसे पिता के स्थानांतरण से शिमला जाना पड़ा था. जाते हुए वह बहुत रोया था.जिस परिवार के साथ अपना पूरा बचपन बिताया उसे भला चढ़ कर कौन जाना चाहता, खैर....
पर्व त्योहारों या ऐसे भी कभीखोज खबर लेने के बहाने बातें होती रहती थीं.जैसे-जैसे कात्यायनी बड़ी होती जा रही थी परिवार वालों की चिंता भी बड़ी होती जा रही थी. अब सृजन इंजीनयर बन गया है और उसे अपने पुराने शहर को जाना है.उसे ख़ुशी इस बात की थी कि वह कात्यायनी और उसके परिवार से लंबे अरसे के बाद फिर से मिल पायेगा.
आज होली का दिन ....सृजन कात्यानी के घर .....हाथ में गुलाबी गुलाल.....
कात्यायनी हरे सूट और पीली चुनरी ओढ़े, उसके
ख़ुशी की सीमा नहीं.सृजन ने चाचा-चाची के पाँव पर गुलाल रखे. बातों का सिलसिला शुरू हुआ और चाची की चिंता व्यथा भी.
"चाची सब अच्छा होगा" सृजन चाची को लगातार समझाने की कोशिश में.पर भला वो क्यों समझती.
"क्या अच्छा होगा ???? कौन करेगा इससे विवाह, भला? क्या तुम ऐसी लड़की से विवाह करना चाहोगे????"
होली ने आज जैसे माहौल को फाल्गुनी रंगों से सराबोर कर रखा हो और कात्यायनी इस माहौल में दुल्हन सी आभा बिखेर रही हो.....
सृजन ने तभी कात्यायनी का हाथ अपने हाथों में लिया और तत्काल ही अपने हाथों में रखे गुलाबी गुलाल को उसकी उसकी मांग में भर दिया.
"दीजिये मुझे आशीर्वाद कि मैं कात्यायनी के लिए एक अच्छा पति साबित हो सकूँ."
वाकई में फाल्गुनी रंगों का ऐसा कमाल....
कभी सोचा ना था.
@Ajha.07.02.17

Friday, 3 February 2017

किस्सा सृजन

चलो आज एक खयाली फिल्म शूट करते हैं....मैं ने सीता से कहा.
"कहाँ चलना होगा!!!!"
"लाल किले...."
"बस में लदा जाय ....कुछ कहानी तो सोचनी  होगी ना...
"कितनी ही तो कहानियां कल ही मैंने जी ली थी मुनिरका से कनॉट प्लेस के रास्ते में"☺☺☺_मैंने कहा.
एक खुंसट से अंकल ....
वो मोती वाली आंटी ... कैसे भीड़ में दब कर
चिल्लाने लगी थी.
और हाँ वो साहब जो बात-बात में बेवजह ही लड़
पड़ते ☺
कैसे मैंने चुटकी ली थी_ "क्या बात है भाई साहब!
बड़ेगुस्सेमें हो ,कहीं सुबह-सुबह भाभी जी से लड़ाई तो नहीं हो गई"☺😊☺☺
"कैसे तड़ेडा था मुझे??? और फिर शान्ति से बैठ गए थे वो साहब."
मेरी सीट कण्डुक्टरके साथ थी. तो हर आने जाने वालों के चेहरे के भाव पढने में मुझे मजा आ रहा था, कि तभी एक प्यारी सी अनजानी सी सुनी सुनाई आवाज़..... "कंडक्टर साहब हमको हौज़ ख़ास जाना है ....बताइयेगाsss कहाँ उतरें हम?
"यही उत्तर जा रे मेरे भाई, और हाँ , आग्गे की मुह करके उतरियो".
मेरी तरफ मुंह करके कंडक्टर साहब हँसते हुए बोले _ बिहारी साला....पहली बार आया है...😊
बस से उतारते मैंने भी उस कंडक्टर की वाट लगा दी थी....भई देख मैं भी बिहारी ही ठहरी 😊😊😊😊चेहरा बिलकुल देखने वाला हो गया था उसका".
" अब जरा बताओ सीते !दिल्ली के बसों से अच्छी कोई जगह कहानी सृजन के लिए हो सकती है भला???" मैंने कहा
"बिलकुल नहीं ..... चलो आज फिर इक कहानी ढूंढ लाते हैं ,लाल किला की सैर दिल्ली के बस से कराते है.".....

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Monday, 30 January 2017

बुद्धम शरणम गच्छामि

"बुद्धम शरणम गच्छामि"

अजब था वो माहौल बड़ा
समाज कोलाहलों के बीच पड़ा
तब राजतंत्र की बातें थीं
निरंकुशता की सौगातें थीं
अतिवादी का वो दौर बड़ा
दकियानूसी से भरा पड़ा
छोड़ राज -पाट और मोह को
वो 'राजकुमार' धर्म की राह चला
दिव्य ज्ञान  जो उसने पाया
'गौतम बुद्ध ' वो कहलाया
'मध्यम मार्ग ' का लोगों को
जो सूत्र उसने बतलाया
कत्लो-गारत करने को'अँगुलिमाल'
भी बौध्द भिक्षु बन बैठा कह कर
"बुध्धम् शरणम् गच्छामि "
सांसारिक सुखों से भरा पड़ा
सम्राट 'अशोक' था नाम जिनका
ना रास आई जीवन की नीरसता
लेकर संग अपने वो काफिला
धर्म की राह पर चल निकला
"बुध्धम् शरणम् गच्छामि "
हे बुध्द ! आज फ़िर देश
तुझे है बुला रहा
भौतिकता की अतिवादी में
असहिष्णुता की राह
पर  है देश है चल पड़ा
सूत्र भी तेरे अब कमज़ोर पड़े
आ फ़िर से एक बार आ
लोगों को फ़िर से
अपना वो सूत्र बता
देश तरक्की पर चल जाये
लोग खुशियों में रम जायें
मध्यम मार्ग का बस यही
एक  सूत्र रहे _
"बुद्धम् शरणम् गच्छामि "
@Ajha.31.01.16
स्वरचित,मौलिक रचना
©अपर्णा झा.

गुड़िया

"गुड़िया"
(आज के विषय पर आधारित कविता)

गुड़िया से मेरा प्यार पुराना
ये तो थीं मेरे दिल का नज़राना
एक अम्बार गुड़ियों का
घर में था सज़ा लिया
बोलती हुई गुड़िया
डोलती हुई गुड़िया
जी हुजूरी वाली गुड़िया
जो आँखों में बसा ली
अब दिल में थी उतर आई
सच की गुड़िया से
विवाह रचा लिया
कुछ दिन तलक वो
गुड़िया सी लगी
फिर बाद में वो बोलने लगी
आज़ादी की वो सोचने लगी
इंसान जो ठहरा मैं अहंकारी
कैद की गुड़िया थी मुझे प्यारी
लगने लगी अब वो भारी
खिलौने वाली गुड़ियों से भी
दिल भर गया
अब आवारा सा रास्तों पे
भटक रहा
गुड़ियों से इंसान सी ख्वाहिश
और फिर इंसान से
गुड़ियों सी ख्वाहिश
कैसा तूँ रक्षक इसका
कैसी तूने लीला रचाई
जो सोच ना सका
कभी इसकी भलाई
@Ajha.30.01.17
स्वरचित, मौलिक रचना
©अपर्णा झा

मेहरबानी

     आज गुड्डू ठीक एक साल का हो गया और ठीक एक साल बाद ही आये हैं उसके ललित मामा.गुड्डू की दादी ना जाने मन ही मन  कितनी ही दुआएं दे रही थीं ललित को.
"ललित बेटा ,क्या जरुरत थी इन तोहफों की???
पहले ही तुमने हमारे लिए कम किया है क्या!!!!"
        दुबला पतला सा एक युवा जो कि गुड्डू की माँ का दूर के रिश्ते में भाई था. बचपन में माँ-बाबूजी की गरीबी से मजबूर हो दिल्ली भाग आया था. आजादपुर सब्जीमंडी में एक फल के होलसेल विक्रेता के यहाँ फल की पेटी ट्रक पर चढाने -उतारने की उसे नौकरी मिली. जैसे जैसे वह बड़ा होता गया ,अपनी ईमानदारी से अपने मालिक का विश्वासपात्र होता गया.वह मालिक का बही खाता से ले सामान की हिसाबदारी सभी देखने लगा.बदले में मालिक ने उसे घर, बीवी बच्चों के लालन-पालन सभी का जिम्मा ले लिया था.
ललित अपने माँ बाबूजी को बेहद प्यार करता था.
एक बार जब उसकी माँ  कैंसर के बिमारी से पीड़ित हुई. डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी थी.ललित ने जैसे-तैसे पैसों का तो इंतज़ाम कर लिया था. अंग्रेजी नहीं समझ पाने के कारण वह डॉक्टर की बहुत बातें समझ नहीं पाता.आप्रेशन की जो भी तारीख मिलती , वह या तो उससे पहले पहुंचता या बाद में. परेशान हो एक बार वह गुड्डू की नानी के यहां पंहुचा. शीला (गुड्डू की माँ)का तब विवाह नहीं हुआ था.ललित ने डॉक्टर से बात करने हेतु , शीला से अपनी मां के लिए उसका वक्त माँगा था.शीला ने उसके कहे अनुसार अपनी नौकरी सके दिन की छुट्टी ले ली थी.
आप्रेशन के दिन शीला पूर्ण रूपेण वहां उपस्थित रही. भली-भांति डॉक्टरों से बातें भी कीं. आप्रेशन हो भी गया परन्तु ललित की माँ बच नहीं पाई.
          इस घटना के तीन साल हुए थे. शीला की भी शादी हो गई . ललित को जब शीला के गर्भवती होने की बात पता चली तो उसने  पूरे नौ महीने तक बिना पैसे लिए उसके ससुराल फलों की टोकरी पहुचवाता रहा. और आज.....
ना जाने फिर से ठीक एक साल बाद गुड्डू के जन्मदिवस पर अपने आशीष और तोहफों संग उनकी खुशियों में शामिल है.....

Friday, 27 January 2017

आज़ादी

-बेटा उठो, सुबह हो गई है...

-और फिर बाबूजी के साथ फसल भी काटना है.

-माँ मुझे खेत नहीं जाना, थोड़ी देर सोने तो दे.
-नहीं खेत तो तुम्हे जाना ही होगा, चलो उठो.
     तभी पास के स्कूल से वंदे मातरम की धुन सुनाई देती है .....
-अरे मुझे तो उठना ही होगा.
-आज तो स्वतन्त्रता दिवस जो है!!!
-बेटा तो हमें इससे क्या मतलब????
-अरे माँ तूँ कब समझोगी! आज स्कूल में गाना      बजाना होगा ,झंडा फहराया जायेगा.
-और जानती हो माँ आज हमें भरपेट खाना और मिठाई भी खाने को मिलेगा.
-आज हमें एक तिरंगा झंडा भी मिलेगा.आज हम सभी बच्चे अपने झंडे ले अमराई में खेलेंगे भी.... बहुत मज़ा आएगा.
-बहुत बोल लिया.चल जल्दी से अब नहा धोकर बाबूजी का नाश्ता लेकर जा. वो बड़े मालिक का खेत जोत रहे हैं.
-और हाँ, एक बात कान खोल कर सुन ले , जश्न हमारे नसीब में नहीं. हमें मेहनत करनी पड़ती है तब जाके कहीं दो जून की रोटी नसीब होती है...
-चल जा अब जल्दी कर....

Monday, 23 January 2017

झुक गया आसमान

-अरे ललित तुम यहाँ !
-कब आये लंदन से ?
-बस एयरपोर्ट के रास्ते सीधे तुम्हारे स्कूल ही आ   रहा हूँ.
-ऐसी भी क्या जल्दी थी ?घर जाकर थोड़ा आराम कर लेते ,तब तक मैं भी स्कूल से वापिस लौट आई रहती. इतना लंबा सफर.... थक तो गए ही होगे.
- नहीं थका हूँ ,मैं जिस कारण से यहां आया हूँ , तुमसे मिलना मेरे लिए बेहद जरुरी था. बस अब तुम आज की छुट्टी ले मेरे साथ रहो. मुझे तुम से कुछ जरुरी बातें करनी है.
-और  ये ! ये तुमने अपनी हालत क्या बना रखी है?
श्वेत साड़ी, मोटे फ्रेम का चश्मा ,क्या हो गया है तुम्हे?
-अच्छा छोड़ो ये सब. तुम्हार यहां आने का प्रयोजन तो बताओ?
-हाँ रंजना, तुम से विदा ले जब मैं उच्च शिक्षा के लिए लंदन गया ,इस वादे के संग कि व्यवस्थित होते ही तुम्हें अपने साथ विवाह कर ले जाऊंगा.
पर वहां,  तुम्हारे अधूरेपन ने मुझे जेस्सी से मिला दिया.
- जेस्सी से विवाह कर ,माँ से आशीर्वाद लेने जब यहां आया था, तुम्हें मिलाया भी तो था उससे....
-बिलकुल स्वभाव में तुम्हारी ही तरह .....
- हाँ ललित, बड़ी प्यारी सी परी है वो. कैसी है वो अब!!!
- रंजना कुछ भी ठीक नहीं. जेस्सी का तुमसे  मिलना ,प्रभावित होना और मेरी हालत कुछ भी तो उससे छिपी नहीं है. बहुत जिद्दी स्वाभाव की है जेस्सी.जिस बात का जिद्द लगा बैठती है उसे पूरा करके ही छोड़ती है. और अब वह जिद्द लगा बैठी है कि मैं तुम्हें ब्याह कर अपने पास ले आऊँ.
-रंजना क्या तुम जेस्सी के इस जिद्द को पूरा करोगी.मेरी खातिर ना सही जेस्सी के लिये तो मान जाओ.
-ललित,  बचपन से ही मैं तुम्हारे साथ पली बढ़ी,पर तुम्हारे साथ का अहसास दसवीं कक्षा में ही हुआ था.तबसे सर्वस्व मैंने तुम्ही को माना. तुम लन्दन गए,उन्ही दिनों इतिहास में मैंने अपनी पीएचडी कर डाली.मुझे प्रोफ़ेसर की नौकरी भी मिल गई थी.
-जानते हो , जब तुमने अपनी और जेस्सी की बात बताई, धक्का तो मुझे बहुत जोरों का लगा था. सर्वस्व त्याग चुकी थी मैं ,परन्तु मेरे अंदर का आत्मबल मुझे टूटने से बचा लिया.तभी मैंने प्रण ले लिया था कि स्कूल के 10वीं कक्षा की बच्चियों को ही इतिहास पढ़ाऊंगी ,तब से ये बच्चियां ही मेरी रंग-बिरंगी दुनिया हो गईं.इतिहास पढ़ाने का लक्ष्य भी तो यही सोचा था कि बच्चो में जैसे भी हो  आत्मबल पैदा कर पाऊँ ताकि बीते पल की कमजोरियों इन बच्चों पर कभी हावी ना हो.
-ललित ,अब तुम ही बताओ, अपने बनाये हुए इस दुनिया से निकल कर जीना क्या तुम से ,या अपने अस्तित्व के साथ न्याय कर पाउंगी?????
आज ललित के संग रंजना का ये रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपनी धरा से मिलन की खातिर जैसे "झुक गया हो आसमान."