Sunday, 25 March 2018
Wednesday, 21 March 2018
बिस्मिल्लाह खान
आज उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की 102 वीं जन्मतिथि पर ना जाने क्यों मांझी की बातें याद करने का मन हो रहा है . जहाँ तक मुझे याद है , संगीत वाद्यों से मेरा परिचय शहनाई के माध्यम से ही हुआ था . उन दिनों शायद संगीत concert में आम लोगों के जाने का प्रचलन ना हो , तो जब शादियाँ हुआ करती थी तो वहाँ शुभ संदेश के लिये शहनाई बजा करते थे . पता नहीँ कब और कैसे मुझे अपने कुछ तार उन धुनों में जुड़े महसूस होने लगे थे. बड़े होने पर बाबूजी से इसका कारण पूछा तो थोड़ा रुंधे गले से बोले _ ये तुम्हें अच्छा लगता हो लड़की के बाप को नहीँ .ये बात थी शहनाई में और इसमें तिलिस्म पैदा करने वाला भला खाँ साहब के अलावा और कौन हो सकता था .
मैं ने खाँ साहब के प्रोग्राम में शिरकत किया , तो यही पाया की उनके सुर को सुनने से ही बात पूरी नहीँ होती थी . उनका अपने शहनाई को इस नजाकत और नफासत से साफ करके उसे देखना , मानो शहनाई से आज्ञा मांग रहे हों कि क्या मैं बजा लूँ और इतना ही नहीँ धुन बजाते हुए बीच - बीच में रुककर वाद्य की तरफ़ इस तरह निहारना की आप को कहीँ दर्द तो नहीँ हो रहा . और जब इन सबसे आश्वस्त हो जाते तो अपनी टोपी को थोड़ा तिरछी करते हुए , चेहरे पर एक निश्छल मुस्कान के साथ उनका पूर्वी धुन छेडना , माशाल्लह खुद को मैं खुशकिस्मत मानती हूँ कि ऐसे तिलिस्म की मैं साक्षी रही . एक बार नहीँ बल्कि चार बार . मेरा मानना है कि जबतक ये कायनात रहेगी , तबतक आपका वजूद रहेगा . फ़िर भी आज क्यों ये कहने का दिल कर रहा है _ खाँ साहब , we miss you a lot .
Aparna jha.
मेरा पहला उपवास(संस्मरण)
"मेरा पहला उपवास"
(संस्मरण)
आज ऐसा विषय दिया गया है जिस पर सोचूं तो ना जाने कितनी हंसी आ जाती है.बचपन से कभी भूख सहने की आदत ना थी.खाना मिलने में तनिक भी देर हो जाय तो रोने लगती थी.तब आजकल का समय थोड़े ही ना था कि कटोरी ले मां पीछे-पीछे भागें और बच्चे ने खा भी लिया तो जैसे घरवालों पर एहसान...
हम चार बच्चे घर के और उसमें भी सबसे छोटी मैं....,कितना किसी को समझने की फुरसत...घर में संस्कार की मान्यता थी या कह लें फौज़ी रूल...खाना बिल्कुल समय पर,या फिर यूँ कि जबतक बाबूजी अन्न को हाथ ना लगाएं तो फिर बच्चों को भी खाने को नहीं मिलता और माँ तो सबसे आखिर में...जो बचा, नहीं बचा वो उसकी किस्मत...भूख तो तब और भी तेज़ लगती जब पर्व त्योहारों का खाना बनता . फिर छुट्टियों वाले दिन बाबूजी किसी ना किसी को आमंत्रित कर ही देते.हमें 'अतिथि देवो भवः' का पाठ जो पढ़ाना था.मत पूछिए खाने की खुश्बू और खाने में विलंब हमारी हालत को क्या कर देता...ना टीवी था, ना और कोई साधन कि मन बहला लेते.खेलने के लिये भी शाम का समय सुनिश्चित….बस खाली नहीं बैठना,या तो पत्रिका पढ़ो या स्कूल की पढ़ाई.लगता था कि काश स्कूल ही खुला होता...कम से कम दोस्त ही साथ होते.काले पानी की सज़ा इससे बेहतर कि पता तो होता कि फलां जुर्म में सज़ायाफ्ता हुए हैं.
ख़ैर जैसे-जैसे बड़े होते गए सबों का अपने गंतव्य के आने जाने की कोई समय सीमा ना रही तो माँ को भी अपनी सोच में बदलाव लाना पड़ा,हांलाकि ये बदलाव उन पर आज भी लागू नहीं है.जबतक कि कोई सदस्य अभी कितनी भी देर तक लगे खाने को कह गया और वो अभी बाकी है, वह अभी घर पर नहीं है और आने की कह गया तो माँ तब भी इन्तिज़ार में भूखी रह जाती थी.मोबाइल और फोन का प्रचलन भी नहीं कि घरों में ये सेवा उपलब्ध हो.
फिर जितनी बार ऐसा होता कि रात ज्यादा होने से भैया होस्टल में ही रह जाता,इधर माँ इन्तिज़ार में भूखे सो जाती. मां का ये स्वभाव मुझे बिल्कुल नहीं भाता था.हमेशा मन ही मन मनाती की हे भगवान ! दुनिया की सभी माँ को इतनी भूख बढ़ा दो ताकि सबसे पहले उन्हीं को खाना पड़े,ताकि सारे नियमों को वह ताक पर रख दे और समझ पाए कि भूख लगना क्या होता है...और उपवास की तो वो दूर दूर तक ना सोच पाए.
खैर,अगर अपनी बात करूँ तो भूख तो बर्दाश्त था नहीं पर किसी भी तरह से मां को बहलाने की हमेशा कोशिश रहती.बड़े हुए तो भी कभी खाने के नाम पर भूखी नही रही,जिस दिन मां का व्रत रहता तो बाहर से ही कुछ खा कर आ जाना भी तय हो गया.उपवास तो कभी मैंने किया ही नहीं और भगवान के आगे नतमस्तक होना तो आया ही नहीं.परन्तु जब विवाह हुआ तो आये दिन कोई ना कोई पूजा और फिर उपवास का सिलसिला..
शायद वो मेरे जीवन का पहला वट सावित्री हो...मां ने व्रत ही कराया था और साथ ही शाम सात बजे के पहले पहले एक ग्लास दूध सामने रख कहते चली गईं_ये दूध पी लो...इसके बाद कुछ खाना पीना नहीं है...कितना गुस्सा आया था माँ पर...कमबख्त घड़ी की सुई भी आगे खिसकने में सौ साल लगा रही थी. मैंने जो सोच लिया तो सोच लिया.जैसे ही रात के बारह बजकर पांच मिनट हुआ कि चुपचाप किचन जाकर मैंने जो दिखा खा लिया कि अब तो वो दिन बीत गया और अगले दिन में प्रवेश कर चुके हैं.यकीन मानिये तब का दिन था और आज का दिन ऐसा कि जब सास या मां परेशान रहती है कि बच्चे पहले खा लो पर रोज दिन मेरा लगभग एक उपवास हो ही जाता है.कभी दिन के तीन भी बज जाते है.कितनी दफे तो नवरात्रे भी पूरे फलाहार पर रह जाती रही.अब कुछ व्रत है जिसे मैं अब भी बिना परेशानी के कर जाती हूँ.लेकिन वो वट सावित्री वाली रात कभी नहीं भूलती , जो मेरा पहला उपवास का दिन था.
अपर्णा झा
किस ओर कदम शिक्षण संस्थानों का...?
"किस ओर कदम शिक्षण संस्थाओं का!!!"
एक समय था जब मैं JNU में पढ़ती थी और मेरी दीदी DU के north campus से philosphy में परास्नातक की विद्यार्थी थी.दिल्ली सरकार ने कुछ ऐसे नियम बनाये थे कि कुछ समय के लिये बस पास की शायद मान्यता रद्द कर दी थी या इसके बाबत कुछ नियमों में संशोधन कर दिए थे जो मुझे उतना याद नहीं आरहा.पर हाँ, कुछ ऐसी बातें आईं कि DU वाले विद्यार्थी जो थोड़े सीधे-साढ़े थे वो अपनी पहचान पत्र दिखाकर बस में बैठ जाता थे और जो थोड़ा दादागिरी वाले होते वो कुछ शायद 'स्टूडेंट' कह जाते,और,अगर कंडक्टर ने हल्की सी भी आना-कानी की तो किसी एक कॉलेज का नाम व पता बता देते....फिर तो बस वाले कि हिम्मत कहां.ऐसे में जब हम दोनों बहनें एक साथ कहीं बस में जा रहे होते तो शिक्षण संस्थानों का अंतर बस टिकट लेने के समय ही स्पष्ट हो जाता.दीदी अपने पहचान पत्र को लहरा कर ही बैठ जाती और मुझे आंखे भी दिखाती कि खबरदार जो तुमने टिकट लिया.परन्तु ये मेरे सोच से बिल्कुल विपरीत की बात थी.एक अहं था कि 50 पैसे या एक रुपये के पीछे कुछ बेइज़्ज़ती ना सहनी पड़े.एक ऐसे यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली छात्रा ऐसा काम नहीं कर सकती.ये सोच शायद मुझमें ही ना हो बल्कि मेरे खयाल से वहां पढ़ने वाले सभी अपने इस अनुशासन में रहते थे.पढ़ने वाले अपनी पढ़ाई में व्यस्त उन्हें रात और दिन का पता नहीं होता था.नेतागिरी करनेवाले भी अपने क्षेत्र में अपना homework पूरा रखते थे.चाहे आप किसी पढ़ाकू के पास बैठ जाओ तो कितनी ही किताबों का सारतत्व एक ही विषय पर एक कप चाय और गंगा ढाबा के बहाने मिल जाता.और यही बात वहां की राजनीतिक जीवन व्यस्था में भी थी.election का मूड हो और GBM का सिलसिला हो, एक छात्र राजनीतिक मंच पर खुद को अंतरराष्ट्रीय,राष्ट्रीय,क्षेत्रिय और विश्विद्यालयी स्तर पर खुद में एक अखबार समेटे हुए होता था जिसे सुनने की इच्छा सबों में होती थी.
आज शिक्षण संस्थानों विशेषकर JNU जैसी जगहों की ये दशा और दिशा देखकर मन आहत होता है....
क्या अब भारतीय शिक्षण संस्थान विशेष कर JNU अपने बेहद ही गिरे स्तर से जानी जाएगी...इसका जिम्मेदार कौन...
शिक्षार्थी क्या वास्तव में अपनी पढ़ाई हेतु यहां आते हैं या कुछ और के लिये...और शिक्षकों की ये स्थिति!!!
क्या बच्चों की स्कूल के स्तर पर कोई खोट है जो कॉलेज के आजाद माहौल को पाकर अपनी शैतानियों को रूप देने लगते हैं या महाविद्यालय का माहौल ही अब ऐसा है...या इसमें राष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव विद्यार्थियों को अपने सदमार्ग से भटकाता है...???
जो भी हो मन आहत है....चिंतित है कि हम अपने बच्चों को भविष्य के जिन हाथों को सुपुर्द कर रहे, वहां हमारा भविष्य सुरक्षित है भी या नही...!!!
अपर्णा झा
मेरी कविता (अंतरराष्ट्रीय कविता दिवस)
अंतराष्ट्रीय कविता दिवस
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"मेरी कविता"
जीवन का उद्गम
जीवन का अंत
और इसके बीच एक काल चक्र
जीवन लंबा भी
जीवन कभी छोटा भी
और तय हुआ जाता एक सफ़र
जीवन एक सपना भी
कभी तमन्ना भी
और इसी उम्मीद में तय होती जिंदगी
जीवन एक ध्येय भी
जीवन एक श्रेय भी
और इसी को पूरा करती हुइ एक उम्र
जीवन कभी टूटता भी
जीवन कभी बिखरता भी
और इसी तोड़ – जोड़ में बीता पल
जीवन शब्दों का सागर
भावनाओं से भरा गागर
और यही है सब जमा पूँजी
मेरी कविताएँ
जो कुछ भी ना माँगे
बस इक अदद कोरा काग़ज़
जो मेरी सारी बातों को लिख जाये
अपर्णा झा 21.03.16
(कुछ पुरानी याद)
Tuesday, 6 March 2018
Setu --- �� --- सेतु: वस्त्रम यानि खादी: वस्त्र यानी खादी और अमीर खुसरो
Saturday, 24 February 2018
हाहाकार
JNU की पूर्व छात्रा होने के नाते विगत कुछ दिनों में इस शिक्षण संस्थान में हुए राष्ट्र विरोधी नारे और आक्रोश ने मन को बहुत अशान्त कर दिया है और मन अनायास ही अनेकों खयालों के सैलाब में डूबा हुआ है .
कुछ हाहाकार मचा
कुछ अंधकार हुआ
इस पार हुआ , उस पार हुआ .
कुछ कोलाहल
कुछ घबराहट
कुछ विचलित
कुछ पथ भ्रमित
कुछ विस्मित
ये कैसी अस्थिरता
कभी सन्नाटा
कभी चिल्लाता
कभी मन इधर भागे
कभी उधर भागे
ये कैसी बेचैनी
कभी विस्मित होकर
कभी सम्मोहित होकर
कैसी ये दहलीज है
कैसा ये पड़ाव है
कभी मन शांति की तलाश करे और
कभी ये अशांत बारम्बार रहे .
क्यों ऐसा बना ये हाल है
ये कैसी जिंदगी की चाल है
जहाँ हर इंसान को अपने आस्तित्व की तलाश है , और देश ,
सहिष्णु - असहिष्णुता के बीच में
बँटा दो भाग है .
कैसी ये तबाही है कैसी तन्हाई
चलो खुद को दिलाशा देते हैं आज यही
ये देश ना कभी टूटा है ना टूटेगा कभी .
@ Ajha 16. 02. 16