Saturday, 28 July 2018

असहिष्णु

इतनी निराशाओं के साथ  जिंदगी को जिया तो क्या जिया ???भ्रांतियों में जीना और फिर कहना कि माहौल खराब है...!!! जिन्होंने यह लिखा और उसे सामाजिक पटल पर रखा तब वह असुरक्षित नहीं हुए,उनकी जान किसी ने नहीं ली  तो फिर ऐसे लेखन से समाज को डराना कैसा!!!मैं समझती हूं देश को बदनाम करने की एक साजिश छोड़ और कुछ भी नहीं…
आप नाम से असुरक्षित हैं, जीना चाहते हैं तो जाकर उस स्त्री के जीवन चरित को जानिये जो अपने माँ-बाप को हंसता देखने के लिये सदैव अपनी आहुति देती रहती है,परिवार बनाने हेतु उसने खुद को भुला दिया और जब परिवार बना दिया तो बच्चे पूछते हैं कि तुम कौन? और फिर भी जीना नहीं छोड़ती,अपनी निराशा नहीं दिखाती, क्योंकि तब भी मां को अपने माँ और स्त्री होने का खयाल रहता है,वो जीना,हंसना और आशीर्वाद देना नहीं छोड़ती कि भले ही उसका जीवन खुद की आहुतियों में गुज़रा हो, पर इस ख़याल से की बच्चे उसके जीवन को देख उसके जीवन के बाद भी संस्कारवान हो जाएं तो भी उसका स्त्री जन्म सफल हो जाएगा.
हम कितने असहिष्णु हो चुके हैं कि छोटी-छोटी बातों पर उबाल खाने लगते हैं....!!!!
अपर्णा झा

*माफ़ कीजियेगा यहाँ अपवाद की बात को अलग रखा है.

मौसम,सगाई,शहनाई,जीवन

मौसम,सगाई,शहनाई
या कहूँ तीनों का जोड़ है जीवन
क्रांतिकारी यदि मन हो और
कुछ करने की उमंग हो
हर मौसम पतझड़ और
बसंत हो जाता है
सगाई 'लक्ष्य' से और
शहनाई बिगुल बन जाता है
हाँ एक मौसम हमने भी
देखा था ऐसा
हरीतिमा ही चहुँ दिशा दिख आई थी
समाज बदलने की जैसे
कोई शपथ ही हमने खाई थी
खून गर्म था, तूफानों से लड़ने का
जोश अटल था
झंडा अपना हम फहराएंगे
ऐसा विवाह हम रचाएंगे
क्या पता था
माँ-बाबूजी का पैगाम भी आना था
माया-मोह ने फिर से
मुँह चिढ़ाना था
बेटी अब समय बहुत हो चला है
अब तेरा बाप बूढ़ा हो गया है
तेरे हाथ भी पीले करने हैं
कर्तव्य ना रह जाए अधूरी
भगवान के घर भी जाना है
अब सबकी तरह मुझे भी सोचना था
मौसम, सगाई, शहनाई का समाज नहीं
परिवार के स्तर पर
महत्व कितना था
कर लिया हाथ मैंने भी पीले
और कर लिया समझौता क्रांति से
अब खुद में ही जीती हूँ
खुद की सोच में मदद को
हाथ खुले रखती हूं
मौसम खुद का अब भी हरीतिमा है
अब अपनी सोच को संतति में भरना है
हाँ,महत्व है इन सबों का...
ये मौसम,सगाई और शहनाई
ये खुशियां है,आशा,चेतना और सपने हैं
यथार्थ यही कि जीवन यात्रा में
सभी एक दूसरे से बंधे हैं,
एक दूसरे से बन्धें हैं.
अपर्णा झा

वो चूड़ियों वाला

"वो चूड़ियों वाला"

"बाबा क्यों बेचते हो चूड़ियाँ
इस उम्र में भी...
कहीं ऐसा तो नहीं,कोई
किस्सा आपकी पीछे है छूट गई"
मेरा तो यूँही मजे का अंदाज़ था
पर लगता था जैसे दिल का
कोई तार
उनका मैंने छेड़ दिया था...
बोले...आ बैठ सुनाऊं तुझे
एक कहानी
सोचो तो मेरी और नहीं तो
एक राजकुंवर की थी
जवानी में एक गुड़िया को
दिल दे बैठा
रोज रंग बिरंगी चूड़ियों से
उसकी कलाई था सजाता
चूड़ियों की खनक...
मानो हमारे  लिये थी
सावन की आमदगी,या फिर
किसी पपीहे ने कोई
नई राग छेड़ दी या
दादुर कहीं  नृत्य कर रहा
और इसी बहाने से अपनी प्रेयसी को
था वह रिझा रहा
दिन बढ़े, और हर बार एक नई
दहलीज को पार किये
पर छूटी ना कभी संग चूड़ियों की
मौसम चाहे कितने आये
उत्सव तो बस जाना उनकी
चूड़ियों के खनक से ही
अपने पर जब तक रही जीवन की
बाग-डोर
ना कम होने दी चूड़ियां और
ना कभी फीका हुआ रंग-रोग
आज आश्रित हूँ भविष्य के कांधो पर
नहीं चलता है अपना कोई ज़ोर
इस बुढ़ापे में हम दोनों को
कर दिया अलग
एक इधर है तो एक उधर
कहीं दूर अकेली बैठी है,वो मेरा
इन्तिज़ार कर रही है
आज उम्र की इस दहलीज़ पर
पैसों की चका-चौंध पर
कुछ भी नहीं मेरा बचा है
हम दोनों के प्यार को
अपनों ने ही फासला दे दिया है
एक तरफ वो,और दूसरी
तरफ़ हम हैं
चूड़ियां हैं,खरीदार है
और बाज़ार कहीं भी ना कम हैं
पर हम जैसे प्यार करने वालों को
यहाँ समझता कौन है
पैसों की नहीं मुझे कोई कमी है
चूड़ियों ही हैं मेरे सोच की साथी
संग दो वक्त का दे और फिर बिक जाती
चूड़ियाँ इस लिये बेचता हूँ, कि तुझ
जैसे बेटियों से थोड़ी देर ही सही
कुछ अपनी कह-सुन लेता हूँ
ना जाने फिर कब उससे मुलाक़ात हो
बस इसी बहाने से अपने
गम को भुला लेता हूँ
गम अपने भुला लेता हूँ
इतना सुनने में ही अपनी तो
हालत बुरी हुई थी,ना सोचा था
इन रंग बिरंगी चूड़ियों में भी
छिपी ऐसी कोई दास्तां होगी
सच ही तो था...
खरीदार ही तो थी मैं
तब से आज तलक सदमे में हूँ,
वाकई उस दिन से
सदमें में हूँ मैं.
अपर्णा झा

Thursday, 21 June 2018

कलम और हुनर

"कलमऔर हुनर"
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कभी कलम ने मेरी नाफरमानी लिख दी
कभी हुनर ने मेरी गुमनामी लिख दी
खैर ख्वाह तो हैं दोनों ही मेरे
पर नज़रों की ये कैसी गुस्ताखी  कि
दरमियान इनके गलतफहमियां कर दी
दिखते तो दोनों एक से
पर एक ने बेवफाई लिख दी
और  एक बावफा हो गई
बदले तो थे अंदाज़ दोनों के
कोई खुश गुमा तो कोई बदगुमा
नुमाया हो चला
सूरत तो थे जुदा उनके
सीरत एक सी ही थी दिख रही
कोई ख्याल बन दिल में बस गया
कोई अलफ़ाज़ बन कागज़ पर उतर गया
कलम बारहा लिखता गया
गलतफहमियां बढ़ती गई
ये तो हुनर ही था
जो काँटों में दामन बचाते गए
पर क्या कहे हम इनपे
ना कमतर ना बेशतर कोई इनमें
हैं दोनों की महदुदियत ओ मखसुसिययत(importance                                                        individuality)
 होती इंतिहाई घड़ियों में ही इनसे
वाकिफियत.
@Ajha.27.10.16

सोच श्रृंखला

सोच श्रृंखला

"श्रृंखला सोच की"
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हर बात से निकलती है
इक बात नई
इक जज़्बात नई
अच्छी और बुरी भी
वो जो अच्छा था किसी के लिए
वही बुरी गुजरे ना औरों के लिये
फिर होंगे इसके कई आयाम नए
और निकलेंगे इसके कई अंजाम नए
इक वक्त नया फिर से आएगा
कई नए हालात पैदा कर जाएगा
इंसान के अंदर से फिर
इक नया इंसान रहनुमा होगा
और ये दुनिया जो
वादों-विवादों में उलझी रहती हरदम
इक 'वाद'(ism) फिर से नया होगा
इसी सोच पर फिर
इक इंकलाब खड़ा होगा
जिस सुबह का था इन्तजार अबतक
आखें खुली ,ख्याल कुछ ऐसा होगा
यही श्रृंखला सोच की,जिस पर
नित्य समाज अग्रसर हो रहा होगा.
@Ajha.25.07.16

आवारगी


"आवारगी "     
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तलाश में एक राह की
पहुँच चुकी है वहाँ ज़िंदगी
तंहाइयों में भी है इक खुशी
अनजानी सी राह भी हो चली अपनी
कितनी आसां सी है हर मुश्किल
ना सोचना अब हल ठोकरों का
मसायिलों को खुद-बा-खुद राह दिखने लगी
ना रही अब कोई मुश्किल
ना कोई अब मुजीर (harmful)
ना मुँहताज़ी ही (needy)
ना ही है महदूदियत (limitation)
ना हि मुहाफिज कोई यहाँ
ना अब कोई मसखरी (ridiculous)
बस मुत्तफिक हूँ
मुत्तहिद  , मुतमईन
आरायिशे दिल
ना कोई तिश्नगी
बस है महफूजियत
इक मौसिक़ी है मिल गई
ममनून हूँ , ऐ ज़िंदगी !(thankful)
कि अब मैं हूँ और मेरी
आवारगी.@Ajha 31.05.16

* आवारगी यानी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग शायर जो अपने लिये एक  दुनिया तलाश लेता है
और वही अब उसकी ज़िंदगी हो.

धमकियाँ

धमकियां
जीवन धमकियों से भरी एक दास्तान
आज तक धमकियों को ही तो जिया है इंसान
क्या कभी सोच पाए कि प्यार से भी बातें होतीं हैं पूरी
कलतक जिस माँ-बाप ने यह ना सोचा कि
प्यार पाने के लिए प्यार जताना भी होता है
पति-पत्नी का प्यार,माँ-बाप का आपसी सौहार्द
जान लीजिये, बच्चे जो देखते हैं
मन में उनके वही भाव पनपते हैं
आपस में जो प्यार और सम्मान जताया होता
याद रहे परिणाम में ये वृद्धाश्रम ना आया होता
बच्चों को पैसा कमाना ही शिक्षा बता कर
जो बचपन ना तरसाया होता
तो होते नही ये दागी नेता और
समाज ना कभी धमकियों से किसी के डरा होता
ना हि होते बिगड़े होते इतने हालात
अब तो संभल जाएं हम करके धमकियों को दरकिनार
अनुभूति बस यही रहे
जहाँ में है प्यार ही प्यार.
अपर्णा झा