Tuesday, 14 August 2018

भ्रम

"भ्रम"
क्यों तलाश तुझे उसकी
जो तुझ से अलग
कहीं और ना गई
खुशियां तेरे अंतस में
तेरा ईश्वर साक्षात तेरे मन में
शायद तेरे लिये
कुछ नया सोच रहा हो
और इस कारण
तुझे लगता है कोई
तुझसे विलग हो गया हो
एक दिन देखना
तेरा भ्रम टूटेगा
एक दिन कोई तेरे अंतस में
जोर से *'धप्पा' दे ये कहेगा
पगली ! कहाँ है तूँ खोई
किसे तूँ इतनी देर से
है ढूंढ रही...
देखो तो..
मैं तेरे पास हूँ
तेरे अंतस में
तेरी सोच में
तेरे ख्वाब में
तेरे हर सवाल के
जवाब में
क्यों भटक रही तूँ
इधर-उधर मेरी तलाश में
जबकि मैं तेरे पास हूँ
तेरे साथ हूँ
जाओ...
व्यर्थ ही गया वक्त और
परेशानी दुनिया भर की
मोल लेली
उदासी दुनिया भर की
चल उठ!
अब तो मुस्कुरा
बावली भई
अब तो पास आ ज़रा
अब तो पास आ ज़रा
मुस्कुरा,मुस्कुरा...
अपर्णा झा

*लुकाछिपी के खेल में जिसे पकड़ते हैं उसके पीठ पर धाप दे कहना होता है 'धप्पा'...यह एक अनिवार्य नियम होता है इस खेल का.☺

बचपन बेमेल

पस्त नहीं कहना इसे
चिंतन में कहीं विलीन है
शायद  शारदे मां के दरबार में
ज्ञान वाचन में तल्लीन है
क्यों परेशान कर रहे इस बच्चे को
याद नहीं खुद की
किताबों पर रख माथे सोया करते थे
और बहाने भी कैसे कैसे...
इसी तरह से सबक हम अपनी
नींद में भी याद करते थे
कहते थे माता सरस्वती नींद में
आएंगी
उलझे सवालों को सुलझाकर जाएंगी
सच ही तो था...
कहां था इतनी पढ़ाई का बोझ
भविष्य संवारने की कहां थी तब
माँ की गोद से ही इतनी होड़
क्यों नहीं अपने ही
इन किस्सों को
अपने बच्चों को सुना नहीं पाते
कैह भविष्य को नाग ये भीषण
भ्रम के इन नागों से डराते हैं
क्यों आखिर क्यों
भविष्य का सुनहरा सपना दिखा
किताबों से डराते हैं
अपने ही बच्चों के लिये क्यों
आखिर क्यों राक्षस बन जाते हैं
आगे क्या होगा....
नाग डसेगा या राक्षस निगलेगा या
भविष्य सुनहरा होगा
सच तो यह है कि वर्तमान ही
नाग बना है,राक्षस बन
निगलने की धमकी देता है
बस करो अब ये खतरनाक खेल
ये तो है बचपन सँग बेमेल
सो जाने दो अभी थोड़ा
खो जाने दो मीठे सपनो में जरा
कि विद्यादात्री आएंगी
माथे पर हाथ फेर कर जाएंगी
और कहेंगी...
बेटा ये तेरे खाने-खेलने के
दिन हैं
स्वस्थ और खुश हाल रहे तूँ
पढ़ाई भी हो जाएगी
भविष्य भी संवर जाएगा
ना बोझ बन,ना खुद को बोझ समझ
खुश रह,स्वस्थ रह
आबाद रह
मां तेरी तूझको यह
आशीष देती है,
यह आशीष देती है.
अपर्णा झा

खिड़कियों को तलाशती जिंदगी

"खिड़कियों को तलाशती जिंदगी"

सुनते आए थे
जीवन के आखिरी पलों तक
इंसान अपना वजूद तलाशता
आगे-पीछे की दौड़ में खुद को आंकता
शायद माटी, दरो-दीवार भी उसे पुकारती

सुनते आए थे
यादों की लकीर बहुत हल्की होती है
पर नहीं,समय के साथ और
गहराती है,उन यादों की लकीरों को
है पहचानता,
जिसे इंसान जीवन पर्यन्त है तलाशता

सुनते आए हैं
जन्म और मृत्यु के मध्य कितनी ही
खिड़कियां, और एक चक्र
आजीवन बंद होने और खुलने का
याद रहती हैं ये खिड़कियां
मन के एक कोने में खोल रखा है

सुनते आए हैं
हवाओं का रुख ये खिड़कियां
पहचान लेती हैं
और बचा लेती ही अनहोनियों से
आंधियों में बंद होने को आतुर
और परवाज़ के लिए खुला आसमान दिखाती है

खिड़कियों को गौर से देखो
इंसानो की ये फितरत बताती है
माना घर के लिए चार दीवार जरूरी है
पर खिड़कियां बंद रखी जाएं
ये कोई मजबूरी तो नहीं है.

उठो ,जागो
सूर्य की किरणें ,शीतल हवाएं
दस्तक दे रही खिड़कियों पे
खोलो पट्ट जरा तो झांको
ये भोर कुछ कह रही है.
अपर्णा झा
04.08.17

मन रोता है...

"मन रोता है कि ये कैसी राजनीति...."

एक फ़िल्म आई थी मधुर भंडारकर की 'page 3'.फ़िल्म हालांकि टीवी पर ही मैंने देखी थी.दो-तीन दिन तक सोचने में ही गुज़र गये. परिणामस्वरूप अखबार की रोज़ की वो पत्रिका का 'पेज 3' जिससे सुबह का तड़का लगता था, विद्यार्थी जीवन में जो चस्का लगा था,वो भूत उतर गया.समझ गई हूँ,बस, बड़े लोगों की कुछ घिनौनी बातें, बहुतों के लिये जीवन की हकीकत है. आज की ही बात नहीं,यही होता आया है.रसूखदार लोगों को किसी का डर नहीं...ना समाज का,ना न्यायपालिका.
अपर्णा झा

बहुत कुछ देखना है

"क्या-क्या नहीं, बहुत कुछ देखना
है बाकी..."

विरोध करना अच्छी बात है.
एकजुटता दिखाना बहुत अच्छी बात है,देशहित की बात है.इससे सरकार और देश मजबूत होता है.लोगों में आत्मविश्वास बढ़ता है.पर आज हालात को यदि तुलना की जाय तो क्या ये जो विपक्षियों की एकजुटता वाकई उन 40 बालिकाओं के हक की लड़ाई है?क्योंकि यदि आश्रमों की बात हो तो बीते कुछ समय में जितने भी बाबा पकड़े गए हैं वह बालिकाओं के उत्पीड़न का ही भंडाफोड़ है जिसमें की विभिन्न क्षेत्रों के रसूखदार लोगों की मिलीभगत रही.वो दिल्ली का मामला हो या किसी और राज्य का....
कहाँ इसप्रकार की विपक्षियों की एकजुटता दिखी.अचानक से हमारे नेताओं को उनके ज़मीर
ने अचानक से कैसे आवाज़ दी है और वह भी बिहार के मामले ने?
कहीं ये एकजुटता बंगाल के मानवीयता से जुड़ने का दूसरा कदम तो नहीं...पहला कदम तो शायद कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री के ताजपोशी का तो नही था?
यदि ये सारी दलील यदि गलत है तो विपक्ष में सरकार की तरह इतनी ताकत तो होती ही है कि वो मुजरिमों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवा तो सकता है.
अपर्णा झा

सखियाँ

मेरी सब सखियाँ  ऐसी हैं जो सिर्फ और सिर्फ मन से जुड़े हुए हैं.इस दोस्ती को16 साल हो चुके हैं...

"सखियां"
सखियों से मिलना...
कितने पल जी उठे थे
चेहरे फिर सबके खिल गए थे
मासूमियत ने उठाये कई सवाल
बहुत दिनों की शिकायत
तुम बस लिखती हो
सबके लिए वो सब कहती हो
दूर क्या गई हमसे
हमे भूल जाने की
तुम भूल करती हो
कल ही की तो बात थी
बैठे हम साथ साथ थे
कितनी ही शिकायतें थीं
कर डाली,खुद से
तुमसे और दुनिया के खयालातों से
मजबूरिये रोज़गार की
संगी जो ठहरे थे
भला बुरा सब कहना-सुनना था
तेरा साजन-मेरा साजन कह
कितने ही मन उद्गार बताना था
और फिर वही हंसी ठिठोली
मेरे हमजोली
याद पुरानी बातों को कर
कितने टप्पे बिस्तर पर
घुलट- पलट कर
लम्हों को जी बैठे थे
कितनी तेरी,कितनी मेरी को
कह बैठे थे
गली के उस चाचा को फिर
याद किया था
गुर्राना उस चाची का सोच
मन शैतान हुआ था
फिर उनकी नैन-मटक्का से
आंखें शरमाई थीं
कितनी कुछ बातें तब याद हुईं थीं
जानें कितने दिन बाद मिले थे
तब के बिसरे अब जो मिले थे
लगता था ऐसे
कल  भी तो मुलाकात हुई थी
लगता है कल ही तो बात हुई थी
कल ही तो मिले थे
आज लगता है जैसे
कितने पल बीत गए हैं
फिर से हम यादों में हैं बस गए .
अपर्णा झा17.06.17

मौसम

"मौसम"
मौसम की खूबसूरती को देखो
बदलते रंगों के इंद्रधनुष को देखो
इसमें मिज़ाज़ों की नजाकत भी है
और नफासत भी
बेरुखी भी मिलेगी और जुदाई का सबब भी
जीवन चक्र की मानिंद है ये मौसम
कोई रूठा है,यदि प्यार है तो फसल
देगा ही...
बंजर होगी जो जमीन,उससे उम्मीद कैसा!!!
सावन का मौसम,हरियाली और कुछ
फुहार चहुं ओर...
मैं तो चली रूठे प्रियतम को मनाने
देखो सखियाँ,तुम ना रूठना
ज्यों तो रूठे, मौसम बदल जायेगा
और,फिर  इन्तिज़ार ही इन्तिज़ार
रह जायेगा
सच यही कि इन्तिज़ार की
उम्र होती है लंबी, शायद
नाख़तम होने की फितरत भी....
आओ मैं मनाती हूँ
देखो,फिर ना कभी रूठना,
ना रूठना.
अपर्णा झा