Monday, 28 December 2015

इश्क का पैगाम

//तक़दीर को जीने वाले ,
तेरा यही अंजाम हुआ
जीते जी तो कुर्बान ही हुए ,
मरने के बाद ही एक जहान मिला .
कभी तारीख़ बनीं , कभी फ़साना बना .

एक मोहब्बत वो थी जिसे नादान समझ लिया
एक मुहब्बत ये जिसे दुनियाँ ने बदनाम कर दिया .
एक मुहब्बत ये कि देश पर अपनी जान दे दिया
पर , मुझमें क्या बसी थी , क्या किसी ने इसका एहतराम कर लिया ?

क्या कहें हम ऐसी रवायतों का
दस्तूरे - जिंदगी का ,
जहाँ तमाशबीन बना है हर कोई
ना परवाह है किसी की कुरबानियों का .

मुहब्बत जिसने भी की , जैसी भी,  जिससे भी की
पाकिजगी तो देखी होती ,
बुतपरस्ती तो देखी होती ,
अंजाम तो देखा होता .

हर मुहब्बत का अंजाम _ जुल्मत ,
एलाने - जंग , और मौत ही क्यों हो
ऐ खुदा मेरे ! कभी बंदों पर भी
तो रहम किया करो .

         कहते हैं " बहुत कठिन है डगर पनघट की " . वाकई बहुत कठिन है, चाहे  वो राष्ट प्रेम हो , व्यक्ति विशेष का अथवा वस्तु - विशेष से प्रेम हो . व्यक्ति विशेष को इसके अंजाम का पता नहीँ होता , ये तो हम और आप हैं जो इसे इतिहास या फ़साना बना अगली पीढ़ी तक पहुँचा देते हैं .

शुक्राना

जिंदगी जो हँस के गुजारनी चाही , गुजर ना सकी,
वो तो खुद से किया एक वादा था जो हँसकर गुजार दी .

जो तेरे दाग थे दामन में , और जो दाग लगे मेरे दामन में ,
उसे कभी धो ना सके , और इसलिये कभी खुल कर रो ना सके .

दुनियाँ के रंजिशों - रवायतों का बोझ कुछ ऐसा था कि ,
कभी ढो ना सके और इसके कभी हो ना सके .

दुनियाँ में अकेले ही आये हैं अकेले ही जाना होगा , इस रीत को निभाना होगा .

तुम कभी नाउम्मीद ना हो , नासाज ना हो
तेरे से वादा था संग रहने का , संग तेरे जिये जा रहे हैं .

नाकामयाबियों का शोक मनाना मुझे मंजूर नहीँ,  इसलिये हर दिन को जश्न की तरह जिये जा रहे हैं .

है तबाहियों का आलम चारों ओर , हिम्मत तो देखिये मेरी _
फ़िर भी खुद को संवारते जा रहे हैं .

अपनी कही

आज जरा 'उमर खय्याम 'को पढ़
       थोड़ा सूफीमय हो गई हूँ .

जिंदगी से इक वादा था चुप ना बैठूंगी कभी ,
चाहे जितने भी तूफान को पार हो करना  .

आवाजें लगाना ना था मकसद मेरा ,
ना था मकसद  हंगामे ही बरपा करना  

एक जगह से जो आई , इक उम्र जो मैंने पाई ,
तजुर्बा ही तो है , जिसे  लोगों को था बताना .

आज जिंदगी के उस मोड़ पे हूँ _ बस इतना समझिये , ग़म और खुशियों के बीच खड़ी हूँ . *

आशा का दिया जो कभी मैंने था जलाया  उसके लौ को बुझाया या आगे बढा रही हूँ .

जिंदगी तो नाम है उतार - चढाव का
क्या मैं उसे पार कर पा रही हूँ ?

सपना बस इतना है _ प्यार रहे , सौहार्द रहें ,
इस जीवन को जिया है , उस जीवन में है जाना  .

*वो स्थिति जहाँ दुनियाँ  ना आप को ग़म से  ग़मगीन  कर पाता और खुशी से आप उत्तेजित नहीँ होते .

मय : मधुशाला

मधुशाला में बैठे ताक रहे थे
कैसा होगा पीनेवाला
पूछा साकी से " कैसी
ये मदहोशी , कैसा ये पीनेवाला
बोली साकी_ अय्याशियों से है भरी
रास ना आयी अब के मधुशाला .
तब की मदहोशी अच्छी थी
सच्ची थी ,
राष्ट्र प्रेम में मर मिटने वाले
आया करते थे मधुशाला ."

वो शब . . .

गुजिश्ता शब की  बात है
भर शब कोई गा रहा था
मानो किसी को वो बुला रहा .
समा भी ऐसी , मानो ,
चाँदनी भी शरमाई - सी ,
काली घटा बादलों में मुस्काई -सी
आहटें , ऐसी कि किसी के आने से ,
सहम गई नार कोई दीवानी -सी .
गीत की तास्सिर  ऐसी , मानो
नार - दीवानी मंद-मंद - मस्त चाल से
अपने दीवाने के तार पर चली आ रही .
हवाओं की शीतलता ,
उसे घूंघट ओढा रही ,  मानो
सबकी नज़र से उसे बचा रही  .
इतनी वो प्यारी शब , मानो
मुझे भी अपनी गुजिश्ता याद करा रही .
जैसे - जैसे सुर - लहरियाँ
मेरे कानों तक आने लगी , मानो
कोई बिसरी - सी कोई , सामने मुस्कुराने लगी .
जितनी भी चाह रहा उसे भूल जाना  ,
क्योंकर वो मेरे क़रीब आ रही थी  .
वो जो गा रहा था , शायद
अपने दिल की गुनगुना रहा था .
शायद अपने भी तार कुछ मिल रहे थे
तभी तो उन तानों पर ,
मैं भी खींचा चला आ रहा था , मानो
अपने अजीजो - जान को मना रहा था ,
ना जाने किस बात से मैं
वाबस्ता हुआ जा रहा था .

Thursday, 24 December 2015

तमाशा

" तमाशा "
बचपन में तमाशा देखना
बहुत बड़ा शौक था ,
जॉक था .
चले जाते थे उँगलियाँ थामे ,
बाबूजी के संग .
कभी खुद को निहारते ,
कभी तमाशे के रंग - ढंग .
हर इक अदाकार सयाने लगते ,
बड़े होने पर हर के मायने
बदले लगते .
क्या जानते थे _
जिस जोकर को देख
हम कभी हँसा करते थे ,
अब सूरते- हाल ये है कि
जोकर के मानिंद
अपनी जिंदगी जिया करते हैं .
पहले जिन बातों पे आती थी हँसी ,
आज वही हालात रुलाया करते .
चलो बहुत हो चुकी है शाम ,
थोड़ा खुद को सँवारा जाये .
बहूत जी लिये ग़म में ,
अब खुद को हँसाया जाये .

लक्ष्य

जब लक्ष्य को साधा है ,
तमाशा भी वही है ,
सूरत भी वही है ,
सीरत भी वही है ,
भीड़ भी वही है .
क्यों कोई फ़िर पथ भ्रमित हो ,
ये तो किस्सा वही  है _
इक तीर - कमान वाला अर्जुन है ,
और उसका निशाना है .