Tuesday, 31 May 2016

अभिभावक ,बच्चे और समाज

              आज हमारे कुछ मित्रों में बच्चों द्वारा की गई नादानियाँ और उसके पश्चात के असर पर एक स्वस्थ बहस छिडी है और सबों से इस बारे में राय जानने की इच्छा भी है.बहुत सारी बातें जहाँ बच्चे एक किशोरावस्था की उम्र में एक बगावती बिगुल बजा बैठते हैं ,जो की इस बात की निशानदेही करता है कि बच्चा अब समझदार होने लगा है पर ,परिवार इस बात को आत्मसात नहीँ कर पाते.बच्चे और परिवार के समझ के बीच का यही फासला ही व्यक्तिव निर्माण में प्रभावशाली भूमिका निभाता हैऔर जीवन पर्यन्त चरितार्थ होते रहता है .यह सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी.
               अभी गुजरे चंद दिनों की बात कर लें 10वीं -12वीं के परीक्षाफल ने ही बच्चे -अभिभावकों में से कितने को आपसी रिश्तों में नज़दीकी या दूरी बढा दी होगी.चिकित्सा एवम तकनीकि शिक्षा प्रवेशफल ने भी कितने घरों में मायूसी दी होगी. क्या जीवन इतने पर ही रुक जाती है क्या ? नहीँ ना , बात बस इतनी कि समाज की बातों को झेलने की हममें ताक़त नहीँ.हमारे साथ भी कुछ गलत हो सकता इस सोच को कभी अपने अंदर आने देना नहीँ चाहते और फ़िर शुरू हो जाती है बात मनवाने की जिद्द.जिसका असर अहं पर भी पड़ता है.कुछ बातों का अगर ध्यान रहे तो शायद कुछ नादानियों को टाली जा सकती है
1_ बच्चे परिवार में रहकर भी खालीपन     के अहसास से गुज़रते हैं , काश कि इस एहसास को माँ -बाप समझ पाते ,

2_ माँ -बाप का आपसी रिश्ता का भी असर बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण पर असर करता है जिसके इर्द -गिर्द ही बच्चे की पूरी ज़िंदगी गुजरती है ( जो कि बहस का एक महत्वपूर्ण विषय हो सकता है )

3_बच्चों के खुद के अंतर्द्वंद में माँ -बाप की भूमिका

4_संस्कार शिक्षा

5_माँ -बाप का अपने नींव से जुड़ा होना ,जहाँ अपनी हैसियत और जो कुछ भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ,समाज में हो रही नई गतिविधियों के बाबत बच्चे में एक पारखी और सूझ -बुझ वाली नज़र पैदा करना माँ -बाप की अहम जिम्मेदारियों में से है
       इन बातों को अगर ध्यान रखा जाये तो शायद ये post हर किसी को विचलित नहीँ कर सकती  दबाव की ज़िंदगी में ज़रूरत नहीँ ,बस ज़रूरत है दृष्टि ,श्रवण और मस्तिष्क पटल को जागृत रखने की.@Ajha.31.05.16

Monday, 30 May 2016

आवारगी

तलाश में एक राह की
पहुँच चुकी है वहाँ ज़िंदगी
तंहाइयों में भी है इक खुशी
अनजानी सी राह भी हो चली अपनी
कितनी आसां सी है हर मुश्किल
ना सोचना अब हल ठोकरों का
मसायिलों को खुद-बा-खुद राह दिखने लगी
ना रही अब कोई मुश्किल
ना कोई अब मुजीर (harmful)
ना मुँहताज़ी ही (needy)
ना ही है महदूदियत (limitation)
ना हि मूहाफिज कोई यहाँ
ना अब कोई मसखरी (ridiculous)
बस मूत्तफिक हूँ
मुत्तहिद  , मुतमईन
आरायिशे दिल
ना कोई तिश्नगी
बस है महफूजियत
इक मौसिकि है मिल गई
ममनून हूँ , ऐ ज़िंदगी !(thankful)
कि अब मैं हूँ और मेरी
आवारगी.

* आवारगी यानी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग शायर जो अपने लिये एक  दुनियाँ तलाश लेता है
और वही अब उसकी ज़िंदगी हो.

Saturday, 28 May 2016

कश्ती भी छीनी किनारा भी छीना
पर हौंसला तो देख मेरा
हमने लहरों में भी जीना सीख लिया.

Thursday, 26 May 2016

सूफी प्रेम

हे प्रिय ! देखो ना
कितना आनंदित हूँ
आह्लादित हूँ
एक अलौकिक नूर से नहाई
चाँदनी रात में
इस सुन्दर सी,अद्भुत सी
अन्गुरी बागीचे में
फूलों की सुंदरता में
खुश्बुई आबोहवा में
अनेकों सुर लहरियाँ
पक्षियों की चहचहाहट
जुगनुओं की चमचमाहट
बसंत उत्सव मनाती ये रात
अनेकों खुशियों की ले के सौगात
पर हाँ ,क्या करना इनका
जब तुम ही नहीँ पास
और जब तुम हो पास
क्या ज़रूरी है _इनका साथ ?

सरबजीत

        अभी दो -तीन दिन ही हुए होंगे,परिवार के साथ "सरबजीत " (सिनेमा ) देखने गई थी.मुझे अंदाजा हो चला था कि यह मेरे तरह की फिल्म नहीँ होगी बावजूद इसके पतिदेव की इच्छा को मान लिया .फिल्म देख भी लिया पर एक बात समझ में नहीँ आई कि इस फिल्म को बनाने का मकसद आखिर क्या रहा होगा  ?
            ऐसे हृदयविदारक दृश्य जो कि मन को विचलित कर जायें , हम बच्चों को क्या दिखाने ले जा रहे ? एक इंसान जिसके नशे की आदत ने अपनी ज़िंदगी का तो खात्मा किया ,पर साथ अपने कितने लोगों को बेमौत जीने के लिये मजबूर कर दिया.परिवार की स्त्रियाँ बेवा और बच्चे अनाथ कर दिये.बात यही दीगर होती जो देश के लिये शहीद होता.
             आज दूसरे देश के जेल और कैदियों की दुर्दशा दिखा क्या हम इसकी दशा सुधारना चाहते हैं या अपने आने वाली पीढी में एक वैमनस्यता की भावना पैदा कर रहे हैं.क्या इससे
फिल्म को देख नशाखोरी में सुधार आयेगी या नशा बेचने वाली दुकानें बंद हो जायेंगी.
               देश तो अपना जवाब अपने हिसाब से  सम्बन्धित देश को दे ही देता है पर ज़रा सोचिये ऐसी हालत में वो परिवार अपनी ज़िंदगी गुज़र बशर कैसे करता है ! मैं फिल्म के निर्माताओं से यही जानना चाहती हूँ कि
  1: इस फिल्म को बना कर वो सम्बन्धित परिवार का सम्मान कैसे वापस लाने वाले हैं.

  2: क्या ये बेहतर नहीँ होता कि देश पर शहीद होने वाले किसी फौजी जवान के जीवन की सच्ची घटना पर आधारित फिल्म बनती जहाँ देश प्रेमf को और बढावा मिलता और समाज फौजी लोगों से और करीब होते.

*ये मेरे मन के उदगार हैं हो सकता है मैं अपनी सोच में कहीँ गलत भी हो सकती , आप लोगों की राय जानना चाहूंगी.l think its a film for those who enjoys sadistic pleasures.but one thing is sure that acting of each one them _ excellent,undoubtedly. 

Wednesday, 25 May 2016

रामराज्य और स्त्री

लोग खुश हुए थे तब
वनवास काट राम अयोध्या
आये थे जब
चहू दिस शोर मची सर्वत्र
नगर में होगा रामराज्य ही बस अब
कैसी खुशी कितनी खुशी में
जिये जा रहे थे तब
किसी ने ना देखा अश्रु धार को
जो बहे सुनयना , सुमित्रा
सीता के आँखों से लगातार वो
राजधर्म का पालन कर
हुए राम ,लक्ष्मण भरत महान
कैसे भूला स्त्री त्याग को ये इंसान
बेहतर हो जो समझ जाओ
सीता की वंशज हो
त्याग ,भाव की मूरत खुद में
तुम बन जाओ
ना कर पाये जो इस बात का ख़याल
समाज तुम्हें तब बतलायेगा
ऊँची कितनी ही कर लो तुम उड़ान
एक डोर ही काफी है
तुम्हें ज़मीन पर ले आयेगा
पर ये कभी ना भूलना
कृष्ण जन्म भी एक साधक
शंकराचार्य भी है प्रवर्तक
राम बन धोबी पाट हर कोई बता
सकता , चला सकता
इंसान वही वो सच्चा है
'वैराग्य' पथ पर जो चल सकता है.

उलझी सी ज़िंदगी

ज़िंदगी अपनी कितनी उलझनों से भर ली
हमने
सामने ही थी खुशी और खुद से दूर कर ली
हमने
हँसते रहते थे हम सदा ना था खामोशियों का
इल्म कभी
ये कैसी तोहमत ,ये कैसे अदावत कि
ज़िंदगी में ना था जिक्र कभी
हर बात को फ़साना बना उड़ा देना
ना थी कोई शिकायत कभी
आज हाल क्यों ऐसा कि किसी में
खैरखवाहि नज़र आती नहीँ
क्यों आदत सी बन गयी कि सोचें
हरदम नासाजगी की
हालत ऐसी बना ली हमने, वो आये तो थे
हाल ही पूछने
गुफ्तगू जो थीं उसे मुझसे करनी,
भरी महफिल से चुपचाप ,वो यहाँ से
तशरीफ़ ले गये
खुदारा खैर नींद मेरी तब खुली जब
शाम होने को आई
ऐसी भी क्या मशरुफियत थी मेरी कि
वो गए और तभी से मैं खाली हो गई
ना था नज़रंदाज़ करना उन्हें पर
क्यों कारे -रोज़गार ने मुझे ऐसा
बना दिया.
अब फ़िर से जी उठी हूँ
मंजिेल भी दीखने लगी है  मुझे
बेशकीमती जो पाया है ज़िंदगी ,
इंशाअल्लाह बखूब जीउन्गी उसे.
@Ajha ,