Monday, 26 December 2016

पर्यावरण सम्वर्धन

पर्यावरण संवर्धन

​"पर्यावरण सम्वर्धन "
प्रकृति से है संस्कृति 
संस्कृति से
प्रकृति का गुणगान 
पंच भूत से बनी प्रकृति 
पंचभूत का है इंसान 
हरियाली इसकी आत्मा,
है और स्वांस भी
प्रकृति प्रदत्त यह पर्यावरण 
हरीतिमा है इसकी शान भी
क्यों कर रहा तू
इसका अपमान 
भौतिकता की ये कैसी
परिभाषा 
अतिवादीे से हुई ये दुर्दशा 
खुद को सम्भ्रांत बताने में 
वृक्षों से खिलवाड़ हो रहा 
प्रौद्योगिकी के नाम पर 
पर्यावरण दोहन से
खुद को माला-माल किया 
सभ्यताओं के ढहने का 
ना कभी कोई ख़याल किया 
क्या होगा फ़िर
आने वाली नस्लों का
क्यों नहीं ये तूँ सोचता
अभी भी तो दर्पण देखना
अब भी कुछ तो हो सुधारना
नवनिर्माण की खातिर 
आओ , एक बार फ़िर से 
प्रकृति की ओर हो लौटना.

Monday, 21 November 2016

रहिमन या संसार में.....

           संस्कृत में एक श्लोक हम पढ़ा करते थे जिसमें तीन के पुरुषों की व्याख्यान की गई है_प्रथम पुरुष,माध्यम पुरुष एवं उत्तम पुरुष. 'प्रथम पुरुष ' की श्रेणी में उन लोगों को रखा गया जो कुछ करना ही नहीं चाहते(यानी सभ्य भाषा में आलसी), 'माध्यम पुरुष' वो जो कुछ करना चाहते है और उस और कदम भी बढ़ाते परन्तु बीच रास्ते में ही उनका लक्ष्य साधना डैम तोड़ देती है. और 'उत्तम पुरुष ' वो जो अपने लक्ष्य पर चलते जाते है चाहे कितनी भी रास्ते में दुश्वारियाँ क्यों ना हो. पर ऐसे लोग बहुत कम ही होते हैं. ग्रीक इतिहास में प्लेटो ने एक राजनीतिक योद्धा की ऐसे ही कल्पना की थी और ऐसा करने में वहां व्यक्ति का चुनाव होता था और चुनावित व्यक्तिओ को कठिन प्रशिक्षण और नियम से होकर गुजरना पड़ता था. खैर ये सब तो हुई राजनितिक इतिहास की बातें , पर इसकी चर्चा भी आवश्यक है. वह इसलिए कि आज भारतीय समाज और राजनीति में जो बदलाव आ रहे उसे यहां के लोग शायद पहले कभी देखा नहीं. हालांकि या कहना गलत होगा कि इससे पहले कोई परिवर्तन आया ना हो. क्योंकि 'इतिहास' समय के संग समाज में आये परिवर्तन की दास्तान ही तो है.
              आज हम जिस परिस्थिति में जे जी रहे हैं , बेशक क्रियाशील हर कोई है, जागरूक हर कोई है अपने भविष्य के प्रति, अपने परिवार के प्रतिऔर अपने सन्तान के प्रति. परन्तु जब समाज या देशहित की बात करें तो हमारी भूमिका संस्कृत के प्रथम पुरुष और मध्यम पुरुष वाली ही होती है. और जब हम देश के हालात और गतिविधि के बारे में चर्चा करते हैं तो कही खुद के लिए 'मध्यम पुरुष' को परिभाषित तो नहीं कर देते......
           हमारे देश की परेशानी ही यही है कि वह प्रथम पुरुष और माध्यम पुरुष बन कर रहना चाहती है और जो थोड़े उत्तम पुरुष होने की चेष्टा भी करते उसे समाज की सहायता और सहानुभूति मिलने के स्थान पर उससे कहीं ज्यादा अवहेलना और तीखे बाण झेलने पड़ते हैं.
  दूसरी परेशानी यह कि जब कोई कार्य समया के मांग अनुसार हो रहा होता है तो उसे किसी 'वाद' के साथ क्यों जोड़ देते हैं? तब जबकि हम और आप इस बात को जानते हैं कि समाज में जब कभी बदलाव आता है तो उसके परिवर्तन (चाहे सफल हो या असफल)को हम नाम देते हैं ना की पहले नाम दे दिया जाता है और फिर उसके अनुरूप क्रिया होती है. यह ठीक वैसे ही मुझे लगता है कि बच्चा अभी माँ के गर्भ में है पर उसका नामकरण कर दिया जाय. परिणाम जो हो वो देखा जाय.
      मोदी जी ने ये तो नहीं कहा की वो समाजवाद लाना चाहते . वक्त की माँ ग के अनुसार कदम बढ़ाया ही है. जो करने वाले होते हैं उन्हें भविष्य सताती नही बल्कि प्रेरित करती है ,ख्वाब देखने वाले ही कमज़ोर पड़ते और समाज को कमज़ोर करते हैं .
       राजनीति में क्या अच्छा होगा और क्या बुरा होगा वह सभी को पता होता है, पर अगर कोई अच्छी बातों के लिए कदम आगे बढ़ाए तो प्रोत्साहित करना हमारा कर्तव्य होता है. यह ठीक उसी प्रकार से की अगर परिवार  के मुखिया पर अगर परिवार के सदस्य विशवास करना छोड़ दे तो वह मुखिया कैसा होग़ा और वह परिवार कैसा होगा इसका अंदाज़ा आप और हम लगा सकते. सोच, समझदारी ,क्रियाशीलता हर मुखिया में होती है परंतु सहारा,सहानुभूति और समर्थन की दरकार उसे अपने परिवार से होती है. दूसरी तरफ परिवार एक बच्चे के सुन्दर भविष्य की कल्पना में बहुत कुछ सही गलत को नज़र अंदाज़ कर उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करते है वैसे ही समाज भी एक परिवार होता है और उसके सुखद भविष्य की कल्पना में हम सब का यह दायित्व बनता है कि देश हित में लिए गए अच्छे कदमों का पुरजोर समर्थन करें और प्रोत्साहित करें. अच्छा समालोचक होना और एक विविधता वाले देश का मुखिया बन नई राहों पर कदम बढ़ाना आसान नहीं . और तब, जब की देश की जनता अपनी रईसी में 'क्यों 'और 'कैसे' जैसे सवाल पूछना भूल वो मॉल और पार्टी की संस्कृति को जी रही और सोच रही की देश का काम देश जाने हम तो अपना काम कर बैठे.
       अभी देश एक ऐसे दो राहे पर खडी है जहां सफलता की सीढ़ी मुश्किल तो लग रही पर कठिन नहीं. बस थोड़े साहस की जरुरत है और भगवान ने हमे कलम का वरदान दिया है तो अपने कर्तव्यों का निर्वहन हो.
@Ajha.22.11.16

Sunday, 9 October 2016

मेरे हमसफ़र

तेरी की,तो तूँ जाने
मैंने सजदे में
सर झुका दिया
मैं ना देखूं
काशी, ना काबा
और  मैखाना ही
तेरे जलवे की बात
जब भी हो
वही हो मेरा बुतखाना भी
वो अंगूरी बाग़ तुम से
वो चश्मे *की आबी आब तुम से (water spring)
ये ताब *चाँद ओ सितारे की क्या कहें(brightness)
ये मौसम सुहाना क्या कहें
बस जान ले इतना
ये माहौल खुशगवार, यानि
तर्जुमा तुम से है
इस माहौल में आ चल
इक घूंट हम भी
लाफ़ानी (immortal)पी लें

जय माँ अम्बे

"जय माँ जगदम्बे "
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खूब जमा है दरबार माँ
आशीर्वादों से भरा
तेरा दरबार माँ
इक अजीब समां है बंधा
सुंदर है तेरी मूरत
हर कोई में बसी तेरी सूरत
हर कोई भक्त तेरा
भक्ति में तेरे है डूबा हुआ
तेरे दरवार में
दिखा ना आज कोई सवाली
जिधर भी गई नज़र
है बस खुशहाली ही खुशहाली
नाचे-गाये है सब मिलकर
बच्चे और नर-नारी
तेरा ऐसा जादू माँ
ना सोच ना फ़िक्र है कल की
मैया हम सब मिलकर मांगे
ऐसा एक वरदान दो
मिलकर हम सब एक रहें
हर एक दिन त्योहारों सा हो
सब का इस धरती पर
कल्याण हो.
@Ajha.31.03.17
स्वरचित:अपर्णा झा

Tuesday, 20 September 2016

बहकाये हुए क्यों

http://wp.me/p7Dq43-7e
बहकाये हुए हो क्यों

कल तक जो था तुतला के बोल रहा

मेरी ही हथेली थामें वो 

हँसते हुए था चल रहा

थी ख्वाहिश जिसे आसमाँ की

आज भला क्यों वो चुप हो गया

तब की बातें थीं, माँ की गोद थी

था वो खुशकिस्मती को लिख रहा

पर वो वरक़ आज कहीं गुम हो गया

ऐसी इक बदहवा चली कि

उसमें कहीं गुम तुम हो गए

कैसा रहबर तुझको मिला कि

सारे आशनाई दूर तुमसे हो गए

ये कैसी बर्बरता तुमने सीखी

लोग मातम हैं मना रहे 

और दूर कहीं छुपे हुए तुम खुश हो रहे

ये राहे बहिश्त कैसी! 

जो जीना तुझे आया नहीं

इस जीवन की ख़ुशी ना मना सके

अनदेखी जन्नत में तुम हो ईद मना रहे

तारीख है गवाह इसकी

'तेरे-मेरे' के किस्से में 

भला ना हुआ किसी का

 नुक्सान ही नुक्सान हर कोई हैं उठा रहे.

बस करो अब इक गहरी साँस लो

रूह को जो इक जिंदगी मिली

ज़रा उसकी कदर करना सीख लो.

@Ajha.20.09.16

Friday, 26 August 2016

विरासत के धरोहर

                   " सांस्कृतिक विरासत के धरोहर "
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                  आखिर पहुँच ही गई मैं मोदीजी के कर्मभूमि पर और उनके प्रिय विषय "बनारसी
बुनकरों "तक. कला संस्कृति में मेरी रूचि ने मुझे जिन माहिर कलाकारों और कारीगरों से मिलवाया है मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि पुराने जमाने के तपस्वियों से मुलाक़ात तो नहीं हुई परन्तु आज के  जमाने में तपस्वियों का रूप मैंने इन्हीं में देखा है. ऐसी कारीगरी, छवि एक फ़कीर-सी, बातें करो तो एक निश्छल सी मुस्कान चेहरे पर और नहीं तो अपनी तपस्या में रमें  हैं ये लोग.
                    वाकई आज जब बनारस के इन बुनकरों और मालिकों से मिली तो पता लगा की इन बुनकरों का जीवन इतना आसान नहीं होता जितनी आसानी से ये हमसे मुस्कुरा कर मिल जाते. एक कमरा जिसमें हस्तकरघा लगा होता , ना कोई शाही बैठक और रौशनी भी ठीक उतनी ही जो इनके काम को अंजाम देदे. इसी धुंधली सी रौशनी के आलम में नित्य अपने कारीगरी से कला को जन्म देना और उसे परवान चढ़ाना, कितनी खूबसूरत और दिलकश सी लगती ये बातें पर इसके पीछे की सच्चाई भी उतनी ही कड़वी.
                आंकड़ों और सहयोग कि बातों को में ना पड़ते हुए इससे परे हमें इस सच्चाई को जानना पडेगा कि इतनी बारीक काम करने में कारीगरों की कम उम्र में ही आँखों की रौशनी घटा देती है और रीढ़ की हड्डी एवं पसलियों को रोगग्रसित कर देती है इस कारण यह बहुत दिनों तक काम करने लायक नहीं रहते. जो पैसा इन्हें मालिकों से मिलता है उसके जीवन यापन योग्य नहीं होता और इस कारण इनके बच्चे पलायनवाद की राह पर हैं.विरासत में मिली कला ,गरीबी की मार और भौतिकटावाद की प्रतिस्पर्धा के आगे अपनी साँसे गिनें क्या यह उचित होगा. ऐसे कारीगर जिनकी लगन और मेहनत से हमारी सांस्कृतिक विरासत विश्व पटल पर हमेशा से गौरवान्वित होते रही है क्या इन्हें लोगों का समर्थन और सरकार की सीधी छत्र-छाया(जहाँ बिचौलिए या मालिकों का इन्हें मुँह देखना ना पड़े) नहीं मिलनी चाहिए ताकि हमारी कला ,कलाकार, और कारीगर स्वछन्द हो ख़ुशी से साँसें ले सके.
                मोदी सरकार ने कदम तो उठायें हैं, पर इतने दिनों की बदहाली के बाद मन हमेशा शंकित रहता है कि आशा के सपने देखने के बाद कहीं फिर से वो कराह ना निकले_
  "थी मुझे जिनसे वफ़ा की उम्मीद, वो नहीं जानते वफ़ा क्या है"_
        ---  मिर्ज़ा ग़ालिब
 
@Ajha. 26.08.16
Copyright @Aparna Jha
Photo and vedeo @Ajha, Aparna Jha.