Friday, 28 September 2018

मन की आवाज

"मन की आवाज़"
--------------------
वो तेरी दुआओं का असर था
जिंदगी रफ़्तार से बढ़ती रही

था नहीं कुछ भी मुक्कमिल पर
एक एहसासे मुक्कमिल बनती गई

दिन बा दिन उम्र ढलती रही पर
उम्र  दराज़    लगने लगी

हवाओं में एहसास तूफानों सा
आज वही 'नसीम' बन दिल को बहलाने लगी

अफवाहों का बाज़ार फिर क्यों गर्म हुआ इस कदर
जिंदगी बेवजह जलाने लगी

यूँ झूठ इतनी काबिज़ हो गई दुनिया पर
सच्चाई बहाने लगने लगी

सच्चआइयों में जीना क्यों हो गया दुश्वार इतना
ईमानदारी मौत के बहाने ढूंढ लाने लगी

कोई तो रहमो-करम होता उस पर,
इतने मौत के साए ना उन पर मंडराए होते.

रहम कर ,रहम कर ऐ दुनियावाले कि
अब तो खुदा भी उस पे रहम बरपाने लगे
@Ajha.28.09.16

Thursday, 30 August 2018

" एक ख़याल ऐसा भी" (बारिश के बहाने)

बस यूँ ही,

" एक ख़याल ऐसा भी"
(बारिश के बहाने)
---------------------------

यूँ तो बारिश ने खूब उधम मचाई आज
हम तो  यूँ ही थे रहे जश्न मना
दूर किसी के आह की हुई सदा
पता हुआ पडोस के घर उनके
अपने का चौथी का अरदास हो रहा
ऐ जिंदगी ये तेरी कैसी पहेली !
एक ही वक्त किसी को फूल किसी को कांटे दे दी
रास आता नहीं तुझे इक संग सबों का खुश होना
एक ही वक्त किसी की मुहब्बत किसी का ग़म हो ली
दूर तलक नज़र गई लोग ही लोग नज़र आये
एक ही वक्त किसी के लिए भीड़ किसी के लिए तन्हाई थी
अमन ओ चैन क्यों नहीं रास आती तुझे ऐ जिंदगी!
एक ही वक्त किसी को अमीरी तो किसी को गुलामी दे दी
वक्त का ये सितम कैसा
क़त्ल ओ ग़ारत से जलाई जो शमा
एक ही वक्त कहीं रौशनी  कहीं अंधियारा भर दी
दरसे-पाकीज़गी जो पढ़ाया होता एक जैसा
एक ही वक्त किसी को जन्नत किसी को दोझख ना मिली होती
ऐ बारिश अब के झूम के इतना तूँ बरस
भीग जाए हर कोई
धूल जाए हर के ऊपर और नीचे का हिसाब
बस जमी रहे खुशियों की महफ़िल
और जन्नत से खुदा जोर से  ये आवाज़ लगाए
हुज़ूर ज़रा हम पर भी तो गौर फरमाएं.
@Ajha.31.08.16

Saturday, 25 August 2018

रक्षा बंधन की शुभकामनाएं

रक्षाबंधन की शुभकामनाएं.

कितने ही दुआओं में पल रही है
जिंदगी,ये कायनात
याखुदा!सबों को खुशियां अता कर
अता कर.
पुरनूर हैं जहाँ, चांदनी से,सरे जा को
रौशनी अता कर.
तस्सवुर में है तस्वीरे जाना की,हरकिसी को
हकीक़त अता कर.
हकीकत भी यूँ जलवागर हो,नसीब इतराये
वो तिलस्म अता कर.
दीदाये खुशनसीबी भी यूँ हो,पैर जमीं को
परवाज आसमान अता कर.
तेरी राहों पर बिख जाऊं गीली बन की
हर जर्रे में तूँ ही तूँ दिखे,ऐ परवरदिगार!
वो नज़र अता कर.
तेरी याद,तेरी आवाज़,तेरा दीदाये कायनात
हरदम,हर घड़ी लब पे रहे
वो ताक़त अता कर.
तेरी सोच,तेरी इनायत हो मेरी मिलकियत हो
ना हो जिंदगी में कोई तन्हाई
वो सबब जिंदगी की अता कर.
बस तूँ,तूँ और तूँ ही रहे,यही जिंदगी,
जिंदगी,जिंदगी रहे
मेरे मौला यही प्यार और
वो कशिश अता कर,
अता कर.
अपर्णा झा

Saturday, 18 August 2018

अंतर्द्वंद

"अंतर्द्वंद"
ये कैसा अंतर्द्वंद
ये कैसी छटपटाहट
मन कहे कुछ और
दिमाग कहे कुछ और
एक इश्तहार
जो चिपकी लगी थी दीवार
शक्ल बड़ी थी जानी पहचानी
लोगों का था उसमें अटूट विश्वास
आज उसी चेहरे में
क्यों उन्मादी का रंग है दिख रहा
मन अशांत बेचैन सा है क्यों मेरा
वो तो अपना काम कर
है चैन से सो रहा
कल तक उसकी बातें ,उसकी जज़्बातेँ
ठीक सी ही तो थीं लग रही
एक-एक शब्द जो बोले
लगता था कसौटी पर खूब गढ़ी
क्या हुआ रातों-रात
यूँ हवाओं का बदलना
चांदनी रात को ग्रहण लगना
कुछ आवाजें सनसनाहट की
खौफ के साये इधर भी और उधर भी
लगता था सांप भी फुफकारता
जैसे विरह की आग में खुद को झुलसा रहा
रात यूँ ही गुज़रती गई
ना जाने कैसे-कैसे सोच की भेंट
मैं चढ़ती गई
सवेरा होते रहा ,अंधियारा छंटते गया
खौफ के बादल हटते रहे
एक नई सुबह का आगाज़
फिर भी मन में बैठी हुई वो बात कि
उन्मादी तो हम में से ही बनता होगा कोई
और फैलाता होगा उन्माद,बहाने से
हमारे ही आस-पास यहीं कहीं
कैसी बीतती होगी उनपे जो थे
हरदम उसके साथ
हरकदम साथ जो चलने को बढ़े
कुछ आगे फिर पीछे को खिसक गए
मुँह छुपा कर शरीफ उनसे निकलते होंगे
क्यों कोई हो जाता है उन्मादी
क्यों सोचने की शक्ति इतनी क्षीण हो जाती
दया कर,दया कर मेरे मौला
सही राह पे चलने की
फिर से इक मौहलत
अता कर ऐ खुदा.
दया कर तूँ दया कर.
Aparna Jha

नास्तिक

मेरी इस कविता को पढ़ कर अपने भाव अवश्य व्यक्त करें . क्योंकि मैं मानती हूँ कि इंसान नास्तिक जन्म से नहीँ होता और मैं ये भी मानती हूँ  कि ये एक अवस्था है नकारात्मक से सकरात्मक सोच की तरफ़ जाने का . @Ajha.04.08.15(बीते साल की कुछ यादें कविता के रूप में जिसे साझा कर रही हूँ.

   नास्तिक
 - - - - - -
क्या हुआ जो
जिंदगी से चले गये .
क्या सोचा _
जी नहीँ पाऊँगा ?
और
दिल का क्या होगा ?
हाँ ,
ज़िंदगी जी मैंने ,
तेरी आसक्ति से दूर ,
मैं नास्तिक हो गया .
अब मैं जीता हूँ ,
खुद की सुनता हूँ ,
अब मैं हूँ ,
मेरा विश्वास है ,
मेरी सोच है ,
एक मार्ग है ,
एक समाज है .
एक आदर्श है ,
लोगों की मदद के लिये
जज्बात हैं .
अब हाथ मेरे दयनीयता
के लिये नहीँ ,
दुवाओं के लिये उठते हैं .
अब मैं आज़ाद हूँ ,
आबाद हूँ ,
खुदा से इंसा बन गया हूँ .
सहारे की मुझे ज़रूरत नहीँ ,
तूफां का डर नहीँ ,
समाजों का डर नहीँ ,
रवायतों का डर नहीँ .
खुदा का डर नहीँ .
मेरा विश्वास मेरे साथ है .
कहते हैं कि
इंसान कभी नास्तिक पैदा नहीँ होता ,
ये तो हालात है जो
नास्तिक बनाती है .
नास्तिकता बुरी तो नहीँ .
खुद को जगाने की ,
खड़ा रखने का विश्वास है .
और
जो जग गया ,
उसे कैसा डर _
इंसान का !
भगवान का ? 
मौत तो शरीरों की होती है .
आत्मा को क्या कोई मार सका है.@Ajha.04.08.16

भूतबंगला

"भूत बंगला"

मत खोलो
इन खिड़कियों को
ये तो भूत बंगला है
सुना है ,कोई अंदर इसमें
घुट घुट के रोया था
सपनो को देखने की आदत थी
सारे जहाँ को अपने सपनों में
संजोया था
खिदमतबरदारी में गुजरी थीं
सुबहो शामें
ग़मों में जो था अबतक उसे हंसाया था
रात होती,थक गया हो हर कोई,फिर भी
रात भर अंधियारे में कबीरा की धुन
लोरियों की मानिंद खुश हो
पहरेदार उसे सुनाता था
परिंदों की आवाज़ें सुब्ह-सुब्ह खिड़कियों से,शायद पेट भर दाना उन्हें भी खिलाया था
ये कौन था जिसने जिंदगी की
नैया उसकी डुबोई
खिड़कियाँ हमेशा के लिए बंद हो गईं
गुज़रो उधर से तो आवाजें सिसकियों की
आज इतने दिन गुज़र गए
कई सारे किस्से गढ़ गए
कोई तारीख और कई फसाने बन गए.
क्या ये सचमें कोई भूत बंगला है
या फिर आज भी इसके अंदर
कोई इंसान सहमा खड़ा है????
Aparna Jha
04.08.17