Monday, 5 October 2015

मृग - मरीचीका

भगवान की पूजा कर रहा इंसान ,
फ़िर भी मज़बूर हाल में जी रहा इंसान .
कहने को तो सुलझा हुआ है इंसान ,
पर अपने ही उलझन में उलझा हुआ हैं इंसान .
कैसी हैं ये रवायतों _
पूजा की , आराधना की
पत्थर की मूरत को तो
खूब सुमर रहा इंसान .
पर,  इंसानों की पूजा को ही
भूल गया इंसान .
संतानों की आशा में ,
परिवार की शुभेच्छा में ,
पूजता गया देवताओं को खूब इंसान .
पर्वों - त्योहारों में खुशी देखी ,
पर नित्य इंसानों की सेवा को
भूल गया इंसान .
क्यों की उत्पत्ति मृग की ,
लो हो गया मृग - मरीचीका की कल्पना ,
जिसके पीछे भाग रहा इंसान और ,
भाग रही दुनियाँ .

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