ये बादे - बहार ,
ये रुस्वाइयों का आलम
काश के आँखों से आँखें मिल जातीं
होता है कैसा वो आलम हम भी ज़रा देख लेते .
हाँ बहारें आईं थीं , संग खिजां भी लाई थीं
ऐ दोस्त बहारों को इलज़ाम ना देना
मौसम ही तो था , अपनी खुशियाँ दे गया
ये भूल थी हमारी के संग उसके बह निकले
ये नज़रों की अदला - बदली
वो ख़ुशी ओ ग़म की आँख मिचौली
रंगत भी है कुछ जुदा - जुदा
माहौल भी कुछ भरा - भरा
फ़िर चहुं ओर पसरा ये सन्नाटा क्यों है
लगता है फ़िर किसी की मौत हो गई
वो तो गहरी नींद सो गया पर
फ़िर से जहान खुशियों में तब्दील हो गई
एक फ़कीर तन्हा जो आया था
आज सुपुर्दे खाक हो गया .
@ Ajha .06. 03. 16
Wednesday, 9 March 2016
ये बादे बहार . . .
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