" ढाई आखर प्रेम का " (कड़ी - 3)
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रिश्तों की सच्चाई (मेरे पतिदेव को समर्पित ये कविता )
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एक सूरत जो
हमेशा, मेरी
आँखों के सामने
है घूमता
उसका होना ही
मुझमें विश्वास है बोता
वही मेरे जीने की
है आस
हर वक्त वो मुझे
ही सोचता
जागे तो ,
नींद में भी वो मुझे
टटोलता
जीवन का उसके बस
एक ही मकसद
खुशबास मैं हर वक्त
रोज़गार चाहे कितनी
भी दे जाएधोखा
वो नही होता कभी
मुझसे जुदा
दूरियों में , तन्हाइयों में
बसती हूँ मैं उसके
हर अंगड़ाईयों में
हर वक्त मुस्काराता वो ऐसे
हज़ार तबस्सुम
न्योछावर हो जैसे
हाथ दुआओं में ही उठी हरदम
चश्मेबद्दुर -चश्मेबद्दूर बस
या खुदा ! क्यों नहीँ ये सब तुझे दीखता
क्यों कुछ नही तुझे सूझता
क्या इससे कुछ भी
नहीँ तेरा वास्ता
मुझे तो बस यही है
पता , ये है _
" ढाई आखर प्रेम का " .
@ Ajha . 18. 04. 16
Aparna jha .
Tuesday, 3 May 2016
रिश्तों की सच्चाई
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