जो अपने होते हैं
वो कभी खोते नहीँ . .
ये तो तेरी नज़रों का धोखा था
जो , भीड़ को भी अपना समझ बैठे .
Monday, 5 October 2015
बेटी
बेटी में है चाँदनी की शीतलता ,
प्यार की है मूरत वो .
उम्मीदों की आस है ,
थोड़े दिन ही तो तेरे पास है .
फ़िर ये कैसे हालात हैं _
औरों की बेटी को रख सकते हो
बहू बना कर .
हाय रे तेरी किस्मत _
अपनी बेटी के लिये
जिंदगी में तो छोड़िये ,
कोख में भी ना दे पाये
थोड़ी जगह बना कर .
घर
घर - घर की रट
सुना करते थे ,
बाज़ारों में भी इनके मुत्तलिक
तमाशे हुआ करते थे _
कम दामों में किश्तों का
दावा किया करते थे .
हमने भी सोचा , चलो
इक घर खरीदा जाये ,
वो घर , जो है सपनों का घर ,
अपनों का घर ,
खुशियों का घर .
यह सोच कर चले ,
चलो कुछ घर दोस्तों के
देखा जाये .
घर की शक्लें देखीं तो
अजब हाल हुआ ,
पसीने से बुरा हाल हुआ .
अजायब घर भी कभी देखे थे हमने ,
पर अब हर इक घर ,
अजायब घर सा हुआ .
इंसान की शक्लों में दिमाग़
को बसते देखा ,
घर जिसे ' दिल का मंदिर '
कहते थे कभी ,
उसे विलीन होते हुए देखा .
क्या करें ऐसे घर का ,
जहाँ ना तालमेल हो दिमाग
और दिल का .
चलो वापिस चले अपनी
झोपड़ में ,
जहाँ खुशियों का पुलिंदा
बसा है मन में .
क्या हुआ तेरे देश को
चाणक्य कैसा था गुरूर
तुझे अपनी सीख का .
जिस देश को तेरी सीख ने
साम्राज्य बना दिया ,
वहाँ का अब बुरा हाल है .
राजनीति बदहाल है .
लोग हैरान हैं
नेताओं से परेशान हैं .
कानून सच में अंधा है ,
ईमानदारों के पास ना कोई
धँधा है .
अब तो भगवान भी
पत्थर से हो गये ,
जाने कहाँ वो ' सोने की चिड़िया' वाले
दिन खो गये .
प्रजातंत्र का दिवाला निकल गया ,
हर जगह हवाला ही हवाला
रह गया .
अब कैसे जिये इंसान
इस घुटन के माहौल में ,
जहाँ बंदर - बाँट और
जमुरे- मदारी सा हाल रह गया .
पत्नी " कवयित्री "
यदि किसी की पत्नी कवि हो जाय ,
उस घर का हाल कोई बताय .
पत्नी तो हो जाय कवि ,
पति को कविता समझ ना आय .
और फ़िर बहाने दस बनाय .
पति आँखें लाल दिखाय , जब
खाने में नमक ना पाय और स्वादविहीन हो जाय समय पर भोजन ना मिल पाये क्योंकि ,
कविता की कोई पंक्ति याद आ जाय .
समय पर कोई मूल काम बिसराय,
तब घर में तांडव खूब मच जाय .
ऑफिस से घर आने में घबराय
कि कहीँ पत्नी चाय के बदले
कोई नई कविता ना सुनाय.
मेरी जैसी पत्नी के लिये
है कोई जतन तो बताय .
मृग - मरीचीका
भगवान की पूजा कर रहा इंसान ,
फ़िर भी मज़बूर हाल में जी रहा इंसान .
कहने को तो सुलझा हुआ है इंसान ,
पर अपने ही उलझन में उलझा हुआ हैं इंसान .
कैसी हैं ये रवायतों _
पूजा की , आराधना की
पत्थर की मूरत को तो
खूब सुमर रहा इंसान .
पर, इंसानों की पूजा को ही
भूल गया इंसान .
संतानों की आशा में ,
परिवार की शुभेच्छा में ,
पूजता गया देवताओं को खूब इंसान .
पर्वों - त्योहारों में खुशी देखी ,
पर नित्य इंसानों की सेवा को
भूल गया इंसान .
क्यों की उत्पत्ति मृग की ,
लो हो गया मृग - मरीचीका की कल्पना ,
जिसके पीछे भाग रहा इंसान और ,
भाग रही दुनियाँ .
ख़रीदार कैसे - कैसे
लोग यूँ ही दुकानदार को
बदनाम करते हैं ,
ये तो हम ही हैं _
जो अपना इमान बेचते हैं .
औरों की नहीँ , खुद की
देखी बयान करती हूँ ,
हैरान तो तब हुई _
जो देखा किसी ख़रीदार को
एक ही चीज़ की दो फर्मायिश करते हुए _
" भैया एक तो शुध्द घी
हमारे खाने को दो और ,
दूसरी वाली
भगवान को चढ़ाने को और
ज्योति जगाने को दो .