Monday, 11 April 2016

ज्योति की आस में . . . .

एक ज्योति की ही तो थी आस
क्यों मंदिर जल के खाक हो गये _

कल तक जो लोगों का मजमा था यहाँ
क्यों आज मौत का सामान हो गये

कैसी तक़दीर लिखी थी विधना ने
अरमानों , ख्वाहिशों में सब तबाह हो गये

देखा ना होगा ऐसा मौत का मन्ज़र
पलक झपकते वक्त के मेहमान हो गये

रहम कर , रहम कर मेरे मालिक
किसी ने भी ना सुनी एक भी , सुपुर्दे - खाक हो गये

क्या कमी थी उसके इबादत में तेरी
कि देखते ही देखते उनकी दुनियाँ वीरान हो गई

ग़म इस बात का नहीँ कि दुनिया वीरान हो गई
ग़म इस बात का , कि तेरी पहचान हो गई .

सहानुभूति .
@ Ajha . 11. 04. 16

मेरे मौला ऐसा तू . . .

बैरागी का मन है
उन्मुक्त है
मनमुक्त  है
ना चाहतों की बातें
ना वस्ल की ख़्वाहिशें
ना कोई सपना
हर कोई अपना
दुनियाँ  चमत्कारों का डेरा
भीड़ में हर कोई अकेला 
खुश रहना है तो अपना सब कुछ त्याग कर
प्रकृति से जुड़ने का प्रयास कर
खोया जो तूने भूल जा
माया के जन्जालों से खुद को  हटा
फ़िर बाकी जो बचा
है वो शून्यता - शून्यता
इस शून्यता को लेके चल
बह्म का तू ज्ञान कर
वैरागियों -सा ध्यान कर
बंधनों में खुद को ना यूँ जकड़
जीवन पर ना एहसान कर .
खुशियाँ से जीना है यहाँ
जमीं को जन्नत कर , जन्नत कर
या खुदा इक रहम कर
एक- सी देखने की नज़र तूँ अता कर
फ़िर ना कोई रहबर
ना कोई मजलूम
ना कोई दीन - ओ - धरम
ना पैमाना
हर दिल आशिकाना - आशिकाना
ख़ुशियों में होगा ज़माना
फ़िर होगा फक्र  अपने नसीब पर
मेरे  मौला !  आफरीन - आफरीन
हो तेरे नाम पर . 
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आज फ़िर इस गेरुआइ रंग ने फूल के बहाने से ही सही मुझे याद दिला गया  _ " बैरागी है मन मेरा "
- - - - - - - - @ Ajha .

Sunday, 3 April 2016

एक सामाजिक सोच : प्रत्युशा के संग

श्रद्धांजलि
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बहुत सोच में पड़ी हूँ कि इस घटना को मैं परिभाषित कैसे करूँ . एक तरफ़ तो हम नारी को सहभागी कहते हैं , सम्मान की दृष्टि से देखते हैं . कन्याओं को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं . हर माँ - बाप जो अपनी बेटी को बेटे से बढ़कर पालन - पोषण दे रहा है , उसे समाज में बराबरी में लाने की कोशिश कर रहा है _ याद रखियेगा समाज और लोगों की मानसिकता किसी बेटी के माँ - बाप से कदापि मेल नहीँ खाती . अगर मेल खाती भी है तो उनकी संख्या अपवाद स्वरूप ही होती है .
     आज प्रत्युशा बनर्जी का इस दुनियाँ से इस तरह से जाना कई बातों की निशानदेही करता है , ये बात और है की जिस चमचमाहट वाली दुनियाँ में उसने क़दम रखा था तो उसके मौत का कारण भी लोग उसे ही ठहरायें , ये कोई आश्चर्य की बात नहीँ होगी .
       किसी भी घटना या दुर्घटना के घटित होने पर कदापि यह ठीक नहीँ कि अनायास ही अंजाम पर पहुँच जाये या फ़िर समय पर दोष आरोपित करें . किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर किसी एक समय या छवि का असर एक पल में नहीँ हो जाता बल्कि जन्म से लेकर ता उम्र जो कुछ भी उसके सामने होता दिख रहा होता है _ चाहे वो समाज की बात हो , परिवार हो या  परिवेश _ ये सभी बातें जाने-  अनजाने ही प्रभावित कर जातीं हैं .
          एक तरफ वर्तमान में तो हम परिवार में इतना बदलाव देख पा रहे हैं जहाँ बेटा- बेटी समान रुप से परवरिश पा रहे हैं पर ऐसा क्या हो रहा है एक पौधा जिसे सींच कर पेड़ बना दिया गया हो पर फल लगने से पहले ही टूट कर गिर जाता है .   मेरा बस इतना मानना है कि हमें कुछ सोच में बदलाव की समाज में आवश्यकता है ना सिर्फ नारी बल्कि पुरुषों में भी असमय मौत , चाहे उसका कारण जो भी हो , समाज को एक गहन सोच की आवश्यकता है .
@ Ajha . 02. 04. 16.
Aparna Jha

Friday, 1 April 2016

इन गुजरे बीते सालों में . . . .

जीवन के इन गुजरे - बीते सालों में
कितनी बातें ऐसी थीं , कुछ याद रहीं
कूछ भूल गये .
फ़िर छेड़ा तराना किसी ने बनके नव जीवन का
बीती बातें याद हुईं , कुछ भूल गये
कितने सावन ऐसे थे , हरियाली थी
फूलों से भरी डाली थी , झूले थे
इनसब में हम खुद को भूले थे
वो भी पल कुछ याद रहे कुछ भूल गये
भादो की वो बरसाती यादें ,
आँसू बन गिर आये थे , कुछ आँसू
टपके थे जो शादी (ख़ुशी ) थे
कुछ आँसू थे जो बरबादी थे
हम भी उनके संग बह निकले
कुछ याद रहे कुछ भूल गये
कम्बल की तो थी बात निराली
जज्बातों को कितने इसमें कैद किये
खुशियों की थी गर्माइश इसमें
कितने ग़म के आँसू इसमें पिन्हान (दफन , छुपाना ) हुए .
कुछ याद रहा कुछ भूल गये
पीली सरसों ने भी दस्तक दी थी
क्या कुछ था पुरजोर कहा
त्योहारों के दिन हैं आये , संग
तुझको तेरा महबूब मिला
इतनी बातें ऐसी थीं , इतनी बातें कैसी थीं
क्यों मन अब वैरागी हो निकला
जीवन के इस आपा - धापी में
कुछ बातें याद रहीं कुछ भूल गये
मन बावरा जब भी शंकित हो जाता है
बहलाते हम इसको अक्सर , देखो इस नभ के
अम्बर को , क्या टूटे तारों का ये शोक मनाता है
हर रात  अंधियारा छाता जाता है , फ़िर
एक नया सबेरा आता है , आओ इसका
स्वागत कर लें , लेके संग अपने उन यादों को
जो कुछ याद रहा कुछ भूल गये .
@ Ajha . 01. 03. 16

क्या अधिकार दूँ . . .

क्या अधिकार दूँ कि लब खामोश हो गये
इन जज्बात की बातों में अल्फाज कहीँ गुम हो गये
ऐ वक्त ज़रा तू भी तो ठहर कि
इक पल को ज़रा मैं भी तो जी  लूँ .

कभी यूँ भी होता गुजरती मैं उन गलियों से
जो पस - मंजर मैं यार होता

इक पल को ही सही
मुझे उनका दीदार होता

ना फ़िर होतीं कोई जिंदगी में चाहते
इबादतगाह ही फ़िर मेरा राह होता

ना फ़िर कोई चाह नेमतों की
ना फ़िर कोई राह जेहमतों की

ना कोई लम्स चाहिये , ना कोई तिशनगी कोई
ना आरायिश ही कोई

फ़कत इक पल का दीदार , इक इजहार
और इक ख़याल कि इसी हाल में
सुपुर्दे खाक हो जाता  .
@ Ajha . 14. 03. 16
Aparna jha

जोगी रा सा रा रा रा

जोगीरा सा रा रा रा रा
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मौसम की इस अदला - बदली में
चढ़ा पहाड़ों  पर भी देखो रंग 
रंगों के इस खेल में
नभ भी हो चला इंद्रधनुष के संग
लो देखो आया फ़िर से बसंत
धरा रंगी है  खुद को फाल्गुनी रंग
देवदूतों का भी देखो ललचाया मन
तभी तो बर्फ़ बारी से किया है
होली का आगमन .
तो बोलो जोगी रा सा रा रा रा .
हम भी इस रंग में रंग जाये
बदल कर भेश 
खेलें , लुका - छिपी का खेल ,
हार - जीत का ना कोई मायने होगा
प्रियतम तुम जीते मैं हारी
यही रहेगा अपना मेल
इन खेलों के संग हम गाते जाये
तो बोलो जोगिरा सा रा रा रा .
@ Ajha 15. 03. 16

जिंदगी तुझ को तो ख्वाब में देखा . . .

ऐसी फूल सी थी छुई - मुई वो
नजाकत उसकी क्या खूब

हँसती - खिलखिलाती है वो हरदम
सुबह की ताज़ी धूप है वो

गुन - गुनाना , चहचहाना , वो बातें बनाना
क्या मासूम सी परी है वो

एक मुजस्सिमा है सरापा नूर का वो
एक बंद किताब की तरह मेरी जिंदगी है वो

जिंदगी तुझको तो बस ख्वाब
में देखा हमने .
@ Ajha . 19. 03. 16

सोच के दायरे कितने तंग . . .

सोच के दायरे भी कितने तंग थे मेरे , सोचती थी ख्वाहिशें हैं मेरी कितनी छोटी - छोटी .

मुक्कमिल होने को ही थी ख़्वाहिशें मेरी
देखा है मैंने  पांवों तले जिंदगी खिसक गई .

हर कोई हैरान होता है तूफां से दिये को बूझते देख
काश कि कोई उस शम्मा को देखता जिंदगी को तूफां से खुद को बचाते हुए

हर किसी को देखती हूँ बेहोशी में जिंदगी को बशर करते हुए
इंसान तो वो है कि बाहोश जिये जाते है .

उसकी यादें ही थीं सरमाया मेरे जीने के लिये
ना था मालूम कि शराब से भी ज्यादा कीमत चुकानी होगी .

चलो अच्छा हुआ कि जिंदगी को मेरे एक रोज़गार तो मिला ,
वरना जिंदगी यूँ ही बीत जाती ख़ुशी मनाते हुए

ये भी अच्छा ही हुआ थोड़ी जेहमत ही हुई 
मुखौटे कितने हैं इस दुनियाँ में  पहचान तो हुई .
@ Ajha 19. 03. 16

वो तेरा ही असर था . . . .

वो तेरा ही असर  था कि तन्हाइयो में भी मुस्कुराते रहे
और अब हकीक़त ये कि तुम नहीँ तो कुछ भी नहीँ .

सुप्रभात .

कितने फ़साद है . . .

आज बड़ी  प्यारी सी कविता  whatsapp पर मैंने पढी . मुझे लगा कि शायद अपनी जगह हर कोई सही सोचता है , परन्तु पढ़ने वाला किस सोच से प्रेरित है , यही से शायद शुरू होता है तर्क - वितर्क , वाद - विवादों का सिलसिला . और इसका अंतिम फ़ैसला भी वही है जो नदी के दो किनारों का , रेल की पटरियों का . असहमति की स्थिति में रेल की पटरियों वाला हाल होता है जहाँ अगर पटरियों को गलती से भी मिला दिया तो रेल की दुर्घटना निश्चित,  पर नदियों के साथ थोड़ी परिभाषा अलग हो जाती है .नदी के आपसी किनारे मिलते तो नहीँ पर अगर दो तीन नदियाँ आपस में एक जगह मिल जाये तो संगम बना देती है , जहाँ संकीर्णता का अंत और विस्तार का प्रारम्भ हो जाता है .
ऐसे ही कुछ सोच का मिलन है यह कविता और अंत में मेरी कविता . . .

समंदर सारे "शराब" होते तो सोचो कितने फसाद होते...

"ख्वाब" सारे हकीकत होते तो सोचो कितने फसाद होते...

किसी के "दिल" में क्या छुपा है बस ये खुदा ही जानता है, दिल अगर "बे नक़ाब" होते तो सोचो कितने फसाद होते...

थी "ख़ामोशी" फितरत हमारी; तभी तो बरसों निभा गई, अगर हमारे मुंह में भी "जवाब" होते तो सोचो कितने फसाद होते...

हम "अच्छे" थे, पर लोगों की नज़र मे सदा रहे बुरे, कहीं हम सच में "खराब" होते तो सोचो कितने फसाद होते...
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शायद जवाबों का सही होना फ़साद हो नहीँ सकता
इक नासमझी ही होती है फसादों
का जड़
क्यों समझते हो कि जवाबों से
फ़साद उठ खड़ा होगा
क्या तुम्हें अपने कहे पर विश्वास नहीँ
दिल में बसा कर जख़्मों को
क्या मिलेगा तुम्हें खुद को तड़पा कर
ये जिंदगी यूँ ही खैरात में मिलती नहीँ
ना हो यकीं तो जा के पूछ लो
मौत और जिंदगी के बीच जूझने वालों से .
@ Ajha . 22. 03. 16
Aparna Jha .

समंदर को खुद पे गुरूर कितना . . . .

समंदर को खुद पे हो गुरूर कितना भी
हमें तो लगे दरिया का साथ ही भली .

ज़िंदगी गुरुरों से चलता नहीँ
टेढ़े - मेढे रास्तों पे आसानी से सफ़र कटता नहीँ

ऊपर देख कर चलने से खाइयां दिखती नहीँ
जो नीचे देखकर चले तो होता  ठोकरों का डर

ज्यों रौशनी में रहने की आदत हो तो इंसान सो  सकता नहीँ
अंधियारे में जीने की आदत हो तो कभी राहे- मंज़िल पा सकता नहीँ

तन्हाइयों में रहना भी हमेशा सुकुनबख्श होता नहीँ
थोड़ी भीड़ की भी आदत हो,  तो हो बेहतरी .

वक्त हमेशा हरपल साथ देता नहीँ
हिम्मते - इंसान हो तो वक्त भी दामन छोड़ता नहीँ

जीवन इक ठहराव है , जीवन इक एहसास है
जीवन इक धारा है , बस संग इसके ही बहें  

माटी के  बने हम पुतले मिट्टी में मिल जाना है  
मानिंदे  वैरागी , मद - मस्त जीवन जी के  जाना है .
@ Ajha .22. 03.
Aparna Jha .

जज्बातों की बात है . . .

जज्बातों की बात है
नुमाइश की ज़रूरत ही क्या
ये तो दिल की बातें हैं
दिल से ही समझी जाती .

सुप्रभात सखि .
@ Ajha . 24. 03. 16

अश्क आँखों में . . . .

अश्क आँखों में कब नहीँ आता
- - - - - - - - - - - mir taqi mir

एक उम्र दराज़ को यूँ गुजरते देखा
इंसानियत को पैरों तले कुचलते देखा
रिश्ते नातों का पैबंद सीलता देखा
अमीरों को गरीबों की थाली छीनते देखा
वो हर बात पे खुद को जज्बातों में बहते देखा
नादां था दिल जिसे हर बात पे रोते देखा
सोचने बैठी थी की अश्क आँखों में कब नहीँ आता . @ Ajha . 24. 03. 16
 
Ek umr daraaz ko yu gujarte dekha
insaaniyat ko pairo se kuchlte dekha
rishte naaton ka paiband silte dekha
Ameero ko gareebon ki thali chinte dekhaa
Wo har baat pe khud ko jazbaaton me bahte dekha
Naadaan tha dil jise har baat pe rote dekha
Sochne baithi ki ashq aankhon me kab nahi aataa .

खिलौने से खेलने का . . .

खिलौनों से खेलना शौक था मेरी जिंदगी का
ना था मालूम कि जिंदगी ही खिलौना हो जायेगी . @ Ajha . 25. 03. 16

वो मेरे हर बात पे तेरा . . . .

जानती हूँ तुझको , वो मेरे हर बात पे तेरा खुश होना
पर ये क्या हर बात पे नाराज़गी , ये कुछ ठीक नहीँ .
@ Ajha . 25. 03. 16

आगाज में ही अंजामे फ़सल . . .

हर कोई सोहबत का असर देखते हैं
हम तो हर किसी को अपनी नज़र से देखते हैं .
कितना फर्क है लोगों के सोचने में
आगाज ही में हासिले फ़सल देखते हैं .
झुंझलाहट इतनी क्यों , जल्दीबाजी भी इतनी क्यों
मजमून का असर होने से पहले ही असर देखते हैं .
कभी तो थोड़ा यूँ भी होता
मांझी से तो कुछ सीखा नहीँ ,
वक़्ते आइन्दगि को कब देखा किसने
वजूदे - जिंदगी को ही थोड़ा जी लेते
इसी बहाने ही सही बहिश्त- ओ - खुदा  का

दीदार होता और फ़िर खुद पे थोड़ा ऐतबार होता .
@ Ajha . 25. 03. 16

वो तेरे इबादत का असर . . . .

वो तेरे इबादत का ही असर था जो मुझे खुदा बना गया
वरना बुतपरस्ती को पूछता है कौन .
@ Ajha 26. 03. 16

हवाओं में नशा

कोई मदहोशियों की बात करता है
कोई हिचकियों की बात करता है
कहीँ हवाओं में नशा तो नहीँ
मुझे तो मौसम का असर लगता है
@ Ajha . 26. 03. 16

तन से दूर हो बेशक बेटियाँ . . . .

आज हम कुछ सखियों की मनोदशा लगभग मिलतीजुलती- सी ही रही. अमिताजी अपने मायके से लौटी थीं , मन्जुलाजी अपनी बेटियों को हॉस्टेस्ट विदा की थीं और मेरे माँ - बाबूजी पहली बार 6दिन मेरे यहाँ हँसी ख़ुशी बीता कर गये थे . सबों ने अपनी मनोदशा का बड़ा ही सही चित्रण किया . तो मुझे भी अपनी मनोदशा
सान्झा करने की इच्छा हुई _

तन से बेशक दूर हो जाये बेटियाँ
मन से कभी दूर जाती नहीँ
एक माँ - बाप का प्यार होती है वो
और दूसरे को अपना बना लेती हैं बेटियाँ
इतना प्यार भरा है दामन में कि
दूर रहकर भी याद आती हैं बेटियाँ .
पराई तो अपने मन से  हमने बनाया है
दूर देस का फ़ैसला भी उसे सुनाया है
कितने संग दिल हैं हम खातिर बेटियों के
हमेशा हिचकियों से अपनी सताया है उसे
अब रहने दो , हरहाल में जीने दो उसे
.मंज़िल खड़ी है बाँहें फैलाये
उसके राहे - सफ़र को और मुश्किल ना करो@ Ajha . 27. 03. 16

बेएहतरामी का ख़याल हुआ . . .

इन आँखों ने आज बड़ा काम किया
ना था उनको अपनी बेवफाइयों का इल्म
अश्क कुछ इस तरह शक्ले - दरया हुई
उन्हें अपनी बेएहतरामी का ख़याल हुआ .
@ Ajha . 27. 03. 16

हर रात इक मौत जीते है . . .

हर रात इक मौत को जीते हैं
हर इक सुबह एक नई जिंदगी होती है
मौत भी कुछ पल रुक के पलट जाती है
हर बार यही मैं कहता हूँ
रुक तो जा ज़रा कुछ पल के लिये
रस्मे-  दस्तूरे - ज़माने की  बाँकी हैं निभाने  अभी . @ Ajha . 26. 03. 16

शरारत जितनी कर लो , शोखी ठीक . . .

शरारत जितनी चाहे कर लो शोखी कुछ ठीक नहीँ
जज्बाती हूँ पर नकारा सोच नहीँ
हार के भी जिंदगी जीना है , पर
दीदार- ए - क़यामत का कोई शौक नहीँ .
जिंदगी को मर - मर के जीना मुझे गवारा नहीँ
जंग जो इक छिडि है जिंदगी के संग
अपनी हकूके- कूवत से लड़ूं
बड़ी मुश्किल से मिली एक उम्र
जाया ना हो , सोचती हूँ
अपनी मंज़िल तक पहुँचूं
हर बार बहार ही मिले , ये तो ज़रूरी नहीँ
क्या हुआ जो एक बार मुश्किल में गुजरूँ
मैंने चमन उगाया  है फूलों में भर कर
चलो इक बार राहे- कांटों से निक़ल कर देखूं .
दर्से  - जिंदगी सीखा गई बहुत कुछ
बस खुद पे ऐतबार कर सफ़र - ए - अंजाम तक
पहुँचूँ .
@ Ajha . 28. 03. 16
Aparna jha

वो चंद अल्फाज . . .

वो चंद अल्फाज ही थे जो तेरी यादों को बरकरार रखा
वो चंद . अल्फाज ही थे जिसने तेरी बातों को याद रखा
बड़ी मेहर्बानियाँ हैं इन अल्फाजों की
ये हमें मिलाती भी हैं और संग जुदाई भी है .
@ Ajha .31. 03. 16

अल्फाज . . .

अल्फाज
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अल्फाजों से दोस्ती अपनी पुरानी है
ये मेरी वो अनकही कहानी है
रिश्ते भी यही निभाती है
जज्बातों को मेरी तुम तक पहुँचाती है
ना कोई शुक्राना इसे चाहिये
ना कोई नज़राना इसे चाहिये
ना ही तौहमत मुझ पे ये लगाती है
बस मेरा रिश्ता इनसे कुछ कोरे काग़ज़
और चंद लफ्जों का है
मेरे सुख और दुःख को बखूबी से उतारती
मुझ जैसा ही है ये भी जज्बाती
मेरी शक्ति है , भक्ति  है ये
जब तक जागूूँ जागे है ये
नींद में भी सपना बनकर , अपना बनकर
सहलाती है , सोते भाग्य जगाती है
अब बोलो कैसे भूलूँ इनको मैं
जो सबसे जुड़ने का एक तार है
मेरे जीने का ऐलान है
खुदा से  मेरी बगावत का फ़रमान है  ,
इसके बिना मेरी ज़िंदगी अधूरी है
हाँ ये मेरे अल्फाज हैं और
मुझे इनसे प्यार है , प्यार है , प्यार है
इसके बिना मेरा जीना दुश्वार है
@ Ajha . 31. 03. 16

इश्क भी ज़हर होता है . . . . .

इश्क की बात भी ज़हर सी होती है , ये तब जाना जो बेमुरवत लोगों से आशना हुए .

ishq ki baate bhi zahar si hoti hai, ye tab jaanaa jo bemuravvat logon se aashnaa hue.@Ajha.31.03.16

तुम्हारी यादों ने . . .

तस्वीर पे शेर :
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तुम्हारी यादों ने क्या कमाल कर दिया
अभी तो तस्सवुर ही था तेरा

बहुत नामुकिन थी ये बातें , पर ये क्या
पूरी किताब लिख दिया .

पसे - चिलमन थीं जो बातें
उसे सरेआम कर दिया .

ना होगा गवारा इस ज़माने को
क्यों ऐसी ख्वाहिश खुलेआम कर दिया .

वैसे भी इन बातों से होता ही क्या
वक्त ने इसे नज़रंदाज़ कर दिया .

इन बातों की गहराइयों को भला समझेगा कौन
इस लिये इन बातों को गुमनाम कर दिया

ज़िंदगी जीने के बहाने हैं कई और
खुद को इन बातों से अंजान कर लिया .

क्यों हर बातों को ग़म में ही तौला करें
इस तरह खुद को खुशकिस्मत इंसान कर लिया.  @ Ajha . 31. 03. 16
Aparna Jha

गुनाहगार ठहरे . . .

हवा जिस ओर चली हम भी साथ हो लिये
पता ना चला कि कब नादानियाँ हुईं
कब गुस्ताखियाँ
ना ही गलतफहमियों का  अंदाजा रहा
ये तो उनकी सोच का नतीजा था
जो हम गुनाहगार ठहरे
ना कोई ख़्वाहिशें ऐसी थीं , ना कोई मंजिलें ऐसी
खुदा पाक रखे , हम तो अपने सफ़र पे काबा को  निकले थे
हमें अपने मंजिले- मकसूद की तलाश थी .
@ Ajha . 01. 04. 16

कविता . . .

अंतराष्ट्रीय कविता दिवस को समर्पित मेरी कविता
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जीवन का  उद्गम
जीवन का अंत
और इसके बीच एक काल चक्र

जीवन लम्बी भी
जीवन कभी छोटी सी
और तय हुआ जाता एक सफ़र

जीवन एक सपना भी
कभी तमन्ना भी
और इसी उम्मीद में तय होती जिंदगी

जीवन एक ध्येय भी
जीवन एक श्रेय भी
और इसी को पूरा करती हुइ एक उम्र

जीवन कभी टूटती भी
जीवन कभी बिखरती हुई 
और इसी तोड़ - जोड़ में बीता पल

जीवन शब्दों का सागर
जीवन भावनाओं से भरा गागर
और यही है सब जमा पूँजी 

मेरी कविताएँ , जो कुछ भी ना माँगे
बस इक अदद कोरा काग़ज़
जो मेरी सारी बातों को लिख जाये
@ Ajha . 21. 03. 16
Aparna Jha

सब कुछ लुटाने को . . .

सब कुछ लुटाने को जी चाहता है
- - - - - - - - - - - - शाहिर लुधियानवी .

मेरी खातिर लिखे वो चंद अशआर
वो तेरे हर बातों में मेरा होना
तन्हाइयों में भी मुझ को ही सोचना
एक मुजस्सिमा भी बनाया है मेरी जुदाई में
तुझ में " मेरी "  आदत बेशुमार होना
अब इससे आगे मैं क्या कहूँ _
दिल - ओ - जान लुटाने को जी चाहता है . @Ajha . 01.04. 16
Aparna Jha
#KaafiyaMilaao

मुजस्सिमा - मूरत ,