हर कोई सोहबत का असर देखते हैं
हम तो हर किसी को अपनी नज़र से देखते हैं .
कितना फर्क है लोगों के सोचने में
आगाज ही में हासिले फ़सल देखते हैं .
झुंझलाहट इतनी क्यों , जल्दीबाजी भी इतनी क्यों
मजमून का असर होने से पहले ही असर देखते हैं .
कभी तो थोड़ा यूँ भी होता
मांझी से तो कुछ सीखा नहीँ ,
वक़्ते आइन्दगि को कब देखा किसने
वजूदे - जिंदगी को ही थोड़ा जी लेते
इसी बहाने ही सही बहिश्त- ओ - खुदा का
दीदार होता और फ़िर खुद पे थोड़ा ऐतबार होता .
@ Ajha . 25. 03. 16
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