पहाड़ी चट्टानों के बीच
था एक टीले पर मैं बैठा हुआ
खुद से बातें कर, आत्ममंथन
था मैं कर रहा
तभी टीले का एक कण टूट कर
हथेलियों में कहीं से आ गया,
फिर इशारों से ही हुई कुछ
बातें दो-चार
था वो भी कहने को कुछ, बेकरार
बोला _तेरी जज़्बातों का मारा
आज मैं पत्थर हो गया
तुम तो इंसान हो गए और,
मुझे पाषाण कर दिया
हूँ तो मैं भी इक जीवाश्म ही
पर मेहरबानियों पे तेरे चल रहा
तेरे प्रेम की इक जांच से
कभी कोयला तो कभी
हीरा मैं बन गया
सोने की सच्चाई पर भी
लगी इक आंच
ना जो हुआ तुझे विश्वास
तपा-तपा के मुझे, तूने
कुंदन बना दिया
वो पत्थर था बड़ा ही जज़्बाती
फिर से बोला, देखो वजन तुम्हारा
तो सहता हूँ और बन पहाड़ ,
आकाश से भी बातें करता हूँ
मजबूरी उसकी भी सुन लो
जब तारे बूढ़े हो जाते
आकाश उसे ना सह पाता
टूट मुझी में, वो भी फिर पहाड़
बन जाता
मेरे हौंसलों की हो तारीफ़
बन बलवान पत्थर से खुद को
पर्वत बना लिया
हमसफर हूँ तेरा
आन-बान और शान हूँ
मैं अडिग, अविचल ,निरंतर पर
तू यहाँ एक मेहमान है
अब मुझ से ही है सुननी
दुनिया को तेरी कहानी
अब तू सोच ,कैसे संजोयेगा मुझे
बना के बंजर चट्टान या
चूमेगा मेरी पेशानी.
Sunday, 19 June 2016
पत्थर
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