कुछ पल अभी गुजारे जो
माँ के साथ
पसरी उदासी घर में आज
बेटी हूँ मैं, भला कब तक
रहती वो मेरे पास
सोचा _क्यों ना बनवा लूँ
इक मूरत ,जो हरदम रहे मेरे साथ
जा पहुंची मूर्तिकार के पास
जो था कलाओं का पारखी
भावनाओं से भरी हुई
मूर्तियां थी खूब उसने तराशी
कलाओं में था उसके खूब निखार
अपनी कल्पनाओं का था वो अदाकार
कभी संग तराशता
कभी धातुओं को निखारता
मिटटी भी खूब उसने थी ढाली
मोम भी खूब पिघलाई और जमाई
चेहरे खूब थे उसने बनाये
किसी को सोलह श्रृंगार तो
किसी में वीर रस समाये
किसी में भर दिया डर और
किसी में मातम बर्बस कर दिया
कोई रास रचैया तो कोई बंसी बजैया
कोई अनारकली तो कोई सलीम
जो अक्स फिर मैंने माँ का दिखाया
मूर्ति गढ़वाने का फैसला सुनाया
नत मस्तक हो अक्स के आगे
बोला ये जांच है मेरे लिए
आज तक मैंने फ़साने उकेरे
ये तो हकीकत है , ना उतार पाऊंगा
इसे कला में अपने ढालने की
ना जुरर्त की है ना जुटा पाऊंगा
एक इस ख़ुशी के चेहरे
के भीतर हजारों गम को
कैसेछुपाऊंगा और
कैसे मैं दिखाऊंगा.
माँ के जज़्बात ही होते हैं
कुछ ऐसे
हाथ खड़े करने पड़ते हैं
सबको ही वैसे.
@Ajha.23.06.16
Wednesday, 22 June 2016
"अनगढ़ माँ"
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment