Thursday, 9 June 2016

मौन

जीवन के इस बगिया में
चिंतन के देखो
कितने फूल खिले
कुछ श्वेत ,कुछ नीलाभ
कुछ रक्त वर्ण लिये.
नभ सी ऊँचाई 
झील सी गहराई
शांत नदी सी रानाई (बहाव )
अंत: में लिये अनंत
ज्वार - भाटा का खेल
क्या इसको समझें _
दर्द या खुशी का मेल !
या खुद की दुविधा
या शांति की परिचायकता
या संघर्षों से डर गये
या तूफ़ानी वेगों से सहम गये
या के प्रेम की है वो स्थिति
जहाँ सारी अवस्थाएँ निशब्द
हो गईं
मन वैराग्य ले है झूमता
'मौन ' की अनेकों अवस्था
कितने रहस्य अपने अंत: में
है छुपा रखा
काश कि , कोरे काग़ज़ पर
लिख देती
शब्दों को ढाल बना
सब कुछ कह देती
वो सब बातें
पर यह सम्भव ना
हो सकता
जब जज्बातों के लिये
शब्द लघु लगने लगे
देखो ___   तभी
'मौन ' चित्त से बातें
करने लगे.@Ajha .10.06.16

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